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आदर्श पीडीएस, घटिया राशन

Last Modified - June 11, 2015, 11:29 pm

छत्तीसगढ़ देशभर में सर्वश्रेष्ठ सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए पहचान बना चुका है.. मनमोहन सरकार के समय प्रदेश को इसके लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। पुरस्कार मिलने के बाद कई राज्यों ने इस व्यवस्था को मॉडल के रूप में अपने यहां भी शुरू किया।.. लेकिन एक चौंकाने वाले ख़ुलासे ने इस सिस्टम की पोल खोल दी है.. दरअसल ग़रीबों को महज 1 रुपए किलो में दिया जाने वाला चावल इतना घटिया है कि वो इंसानों के खाने लायक नहीं है.. सैंपल की जांच में चावल में चूहों के मल समेत कई हानिकारक तत्व पाए गए हैं.. ये विडंबना ही है कि धाने के कटोरे के बाशिंदों को ही ये घटिया चावल बांटा जा रहा है... अब सवाल ये भी है कि ना जाने कब से गरीबों को ये चावल बांटा जा रहा है..यहां पूरी तरह से साफ कर दूं कि इस बात का ज़िक्र करने का मेरा ये कतई मतलब नहीं है कि सरकार की ये व्यवस्था या उसकी मंशा सही नहीं है.. सरकार की मंशा गरीबों की थाली में भोजन पहुंचाने की तो है लेकिन इसके लिए तैयार किए गए सिस्टम में खामियां भी हैं.. चाहे वो इसे लागू करवाने वाले अफसरों की नीयत में हो या चाहे धान के उठाव के बाद उसकी कस्टम मिलिंग करने वाले राइस मिलर्स की मंशा में.. क्योंकि खामियां अगर नहीं है तो क्यों छत्तीसगढ़ के गरीबों के हक का निवाला पड़ोसी राज्यों तक पहुंच जाता है.. खामियां अगर नहीं है तो क्यों दूरदराज के कई इलाकों में लोगों की थाली तक ये राशन सालों से नहीं पहुंच पाया है.. खामियां अगर नहीं है तो क्यों गरीबों को मिलने वाले राशन की दलाली से साहूकारों के गोदाम और जेबें भरी रहती हैं ..अब जरा इस व्यवस्था पर गौर करें, वर्तमान में प्रदेश में 62 लाख परिवारों को एक रुपए किलो की दर पर 35 किलो चावल दिया जा रहा है। शहरी इलाकों में 25 किलो चावल के साथ 10 किलो गेहूं दिया जा रहा है। केंद्र सरकार केवल 17 लाख परिवार को ही बीपीएल श्रेणी का मानती है। लिहाजा बाकि परिवारों को राज्य सरकार अनुदान देकर राशन उपलब्ध करा रही है। धान का समर्थन मूल्य 1410 रुपए प्रति क्विंटल है। इसकी मिलिंग के बाद चावल बनाने में 21 रुपए प्रति किलो की लागत जाती है। यानी 20 रुपए सरकार अपनी जेब से भरती है लोगों को 1 रुपए में चावल देती है.. इसी व्यवस्था ने प्रदेश के मुखिया को चाउर वाले बाबा का तमगा और लगातार तीन बार सत्ता की चाबी सौंपी.. ऐसे में अगर इस सिस्टम में गंभीर खामियां उजागर हुई हैं तो दाग तो सरकार के दामन पर ही लगे हैं... लिहाजा तुरंत इन खामियों की वजहों को तलाश कर उसे दूर करना बेहद जरूरी है.. वरना लोगों की सेहत के साथ ही सरकार की सेहत भी बिगड़ सकती है।

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