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आस की फांस:इंतजार कीजिए साल बाकी हैं

Created at - June 13, 2015, 11:15 pm
Modified at - June 13, 2015, 11:15 pm

एक बार फिर आम जनता को यही सवाल कचोट रहा है कि 'उसे क्या मिला?' केंद्र और राज्य सरकारों के संदर्भ में मन को ये सवाल बार-बार कचोट रहा है। दिल्ली,मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार इन सभी के लिए मतदाताओं ने यानि आपने-हमने जिस परिवर्तन की आस में वोटिंग की,जिन विशेषताओं पर रीझ कर इन सभी जगहों पर दलों को ऐतिहासिक जीत की ताकत दी है,उसके शुरूआती साल और कुछ महीने देखकर कोई भी संतुष्ट या सुकून तो महसूस नहीं कर पा रहा है।देश की राजधानी दिल्ली से जहां साल 2011 में जब अन्ना की अगुवाई में सारा देश उठ खड़ा हुआ,धरने दिए,सड़कों पर निकला,इंकलाब के नारे लगाए,बच्चे-युवा-महिलाएं,टीवी-रेडियो-सोशल मीडिया हर जगह आंदोलन को जिया। जब 'अन्ना की क्रांति' की कोख से केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जन्मी तो बड़ी उम्मीद से उसे वोट दिया।पहले गजब तरीके से सपोर्ट लेकर सरकार बनाना-फिर 49 दिन में उससे भी अजब तरीके से सत्ता छोड़कर जो सियासी बचकानापन 'आप' सरकार ने दिखाया उसे भी जनता ने ना सिर्फ अपनी संतान की गलती की तरह माफ किया बल्कि दूसरी बार इतना सपोर्ट दिया कि वो खुद भी अभिभूत हो गए,रास्ते से विरोध कांटे तो छोड़िए,विरोधी दलों की झाड़ियां ही उखाड़ दी लेकिन नतीजा क्या मिला,दूसरे दलों जैसे ही धोखेबाज़ झूटे सर्टिफिकेट वाले मंत्री,केंद्र-राज्य की सियासी खीचतान,प्रशासन-पुलिस की अधिकार की रस्साकशी। कौन कितना सही,कौन कितना ज्यादा गलत इस बहस में पड़ें बिना, सवाल ये कि हमें इस पॉलिटिकल ड्रामे से क्या मिलेगा ? दिल्ली सरकार की लड़ाई जिनसे है यानि केंद्र की बात करें तो उसकी सारी कड़वी दवाएं देश ये सोच कर हंसते-हंसते पीता जा रहा है कि चलो जब देश की सेहत सुधरेगी तो बेहतर नतीजे मिलेंगे ये ठीक वैसा ही है जैसे हम अपने बच्चों के फ्यूचर के लिए अपने वर्तमान में कटौती कर धन,श्रम,बल,ज्ञान लगाते हैं ताकि उसका भविष्य बन सके,पर यहां भी हर किसी के मन में यही डर है कि कहीं कड़वी दवा के बाद पांच साल बाद नया रोग ना मिल जाए,जैसे कश्मीर में सराकर बनाना या धारा 370 हटाने के मुद्दे पर हुआ है। बीजेपी ने कहा हमारे पास पर्याप्त सपोर्ट नहीं ये ठीक वैसा ही तजुर्बा लगा जैसे 2 करोड़ के टार्गेट पूरा करने पर शाबासी की उम्मीद रखने वाले कर्मचारी को साहब 4 करोड़ का टार्गेट देकर 'ऑल द बेस्ट' कहकर विदा कर देते हैं ।मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी सरकारों को तीसरी बार जनता ने भारी वोट देकर भरोसा जताया सोचा अब तो विकास की राह में कोई रोड़ा(पहले केंद्र से पर्याप्त सपोर्ट ना मिलने को लेकर बताया जाता है) नहीं रहा है सो अब तो गाड़ी विकास राह पर ऐसी दौडेगी की बस पूछिए ही मत। लेकिन सारी दुनिया में 'मेक इन मध्यप्रदेश' का ड्रीम संजोने वाली सरकार की नाक के नीचे ही 10 सालों में हजारों फर्जी डॉक्टर्स,मुन्नाभाई,नाकाबिल लोग लाखों होनहारों का हक़ और हमारे भरोसे का कत्ल कर रहे हैं। व्यापमं घोटाला/डी-मैट ऐसे कई 'एंट्रीगेट एक्सपोज़' हुए हैं जो अक्सर धनकुबेरों द्वारा अपने मासूम नाकाबिल बच्चों को MBBS की सीटें खरीदकर गिफ्ट करते रहे और बदले में उन्हें मरीजों की जान से खेलने का सर्टिफिकेट मिलता रहा। छत्तीसगढ़ जिसकी सबसे बड़ी खासियत PDS जिसे राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अवार्डस से नवाजा जाता रहा,उसी राज्य में PDS का अनाज सड़कर/धुलकर/घुन लगकर या तो फिकता है या खुले बाजारों में बिकता है। जिसके आंकड़े सत्ता पक्ष और विपक्ष की किताबों में अलग-अलग उनके मुताबिक होंगे हकीकत तो वो भी बेहतर जानते हैं। इन सब के मूल में सबसे बड़ी त्रासदी ये कि आखिर ये भरोसे का कत्ल,आस की फांस पाचं साल में कितना लहू-लुहान करेगी । बड़ा सवाल ये कि क्या अब देश, किसी 'आम पार्टी' या 'खास शख्सियतों' या फिर 'अच्छे दिन' और 'बुरा दौर खत्म' के इंकलाबी नारों का विश्वास कर पाएंगे। वैसे पार्टियों के पास तर्क तैयार है - इंतजार कीजिए अभी साल बाकि हैं ।


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