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'फर्जी' के सहारे....फ्यूचर ?

Last Modified - June 21, 2015, 7:08 pm

बदलते दौर में बहुत कुछ बदल रहा है।मौजूदा दौर में रफ्तार है,धार है और वार भी है। रफ्तार सब कुछ जल्दी से जल्दी पा लेने की,धार ऐसे तर्कों की जिसके आगे कई बार सच भी बौना प्रतीत होता है...और वार उन मूल्यों पर जिन्हें जीवन आधार बनाकर कई पीढ़ियों ने सफलता का भविष्य रचा। मामला बेहद करीबी 'लाइक फैमिली' जैसा है। कब,कौन,कहां नाम मायने नहीं रखते..मायने ये घटना रखती है,जिसमें एक मां ने अपने सपूत को ये समझाने के लिए कहा कि-'होनहार बेटे' को ये समझाइए कि फर्जी डिग्री पर बेस्ड फ्यूचर,ओस की बूंद पर गढ़े चित्र जैसा है,जो पत्ता हिलते ही खत्म हो जाएगा। जब सदा अपने बेटे का पक्ष लेने वाले पिता को..बेटे से ये तक कहना पड़ा कि 'सुपुत्र ज्यादा नहीं बस 33 नंबर ले आओ पर फर्जी डिग्री का विकल्प ना चुनों' और आज की पीढ़ी का वो 'होनहार युवा' जिसके कुछ साथियों ने 97% और 98% नंबरों से हमें भी अचंभित किया,वो एक विषय में पूरक परीक्षा देने के बजाय फर्जी डिग्री लेना ज्यादा बेहतर मान चुका है। हमारी समझ को झकझोरते उसके तर्क कि ऐसा हो रहा है-कईयों ने किया है-मेरे पास ऑफर है-तो मैं क्यूं अपना कीमती वक्त बर्बाद करूं। 'होनहार युवा' के माता-पिता ने मुझे कहा कि आप समझाइए,हम तो थोड़े ओल्ड फैशन हैं,आप इस युवा की नज़र में थोड़े मॉर्डन हो,सो प्लीज आप समझाइये। तकरीबन घंटे भर की मशक्कत,मुट्ठी भर उदाहरण और अब तक के तजुर्बे को समेट 'यंग जनरेशन' की भाषा में,उन्हीं के अंदाज में समझाने का भरसक प्रयास किया,लेकिन फर्जी डिग्री के किसी सौदागर की बातें इस कच्ची उम्र के,पक्का मन बना चुके 'युवा' पर ऐसा असर डाल चुकी थीं जैसे सर्पदंश की मदहोश अवस्था,जिसका अंत भयानक और निश्चित है। यहीं से जन्मा एक ऐसा कड़वा,भयावह सच जिसका सामना कई लोग कर रहे हैं। क्या है इन डिग्रियों का महत्व महज काग़ज के एलिजिबिलीटी के टुकड़े ? वो साल भर की मेहनत से मिला बेहतर नतीजे का सुख अब बेमानी है ? दूसरी तरफ 'फर्जी डिग्री' में मनमाफिक अंकों वाली सफलता उन छात्रों की मेहनत पर मुंह चिढ़ाती नज़र आई,जिनकी नज़र पढ़-पढ़ कर युवावस्था में भी मोटे चश्मे वाली हो गई है। बार-बार मन में परिचित दिग्भ्रमित युवा का वो तर्क भी हथौड़ा मार रहा था कि मेरे पास ऑफर है,ये तो होता है,हो रहा है। तो क्या होगा उस आदर और विश्वास का जो किसी भी अच्छे अंकों वाले सर्टिफिकेट को देखकर अक्सर मन में उपजता है ? अंकों की दौड़ में कैसे सामना करते होंगे असल मेहनतकश स्टूडियस छात्र ? क्या अब हर 95फीसदी अंकों वाली मार्कशीट पर शक करना होगा? क्या ऐसा करना ईमानदार छात्रों को अपमानित नहीं करेगा ? क्या वाकई मेहनत,ईमानदारी,सच्चाई की दलीलें..इस फेसबुकिया जनरेशन के लिए कोई मायने नहीं रखतीं ? और अगर ऐसा है तो कैसे बचेंगे आप और हम इस फर्जी के हलाहल वाले दौर से । फिर क्यों हैरत होती है 'कुछ' पढ़े-लिखे क्वालीफाइड प्रोफेशनल्स के लापरवाह रवैये पर ? वैसे बचपन की सबसे पुरानी सीखों में से सुनते आए हैं 'सांच को क्या आंच'...पर फर्जी डिग्रियों की ये आंच तो आज परिचित,पड़ोस,आस-पास पहुंच ही गई है। तो क्या आश्चर्य कि कल ये आपके-हमारे घरों की चौखट के भीतर भी दाखिल हो जाए। कैसे पहचानोगे फर्जी डिग्री वाले लोगों को आप ये तो आज-अभी हर पल की चुनौती है ही पर उससे भी बड़ी चुनौती ये भी है कि कैसे इस जहर के असर से अपने घर,अगली पीढ़ी को बचाएंगे ? फेसबुक-व्टास ऐप जेनरेशन से बस एक ही सवाल है...सवाल क्या अनुरोध है...फर्जी डिग्रियों के मॉल में आपको मनमाने नंबर्स वाले डग्री भले ही मिल जाएगी,पर मेहनत से,ईमानदारी से पाया खालिस प्रोफेशनल एटीट्यूट और आत्मविश्वास के क्या उनका ये छद्म डिग्री आवरण काम आएगा? क्योंकि आवरण चाहे कितना ही रेश्मी क्यों ना हो,प्रैक्टिकल हवा में तार-तार जरूर होता है। जिस होनहार के सवालों ने मन में ये हलचल पैदा की है,उसके माता-पिता ने बच्चे की एजुकेशन,स्पोर्ट्स और क्यूरिकुलर एक्टिविटी पर सामर्थ्य से ज्यादा खर्च कर ये सपना देखा उनके बच्चे का फ्यूचर ब्राइट होगा...आज उन्हीं आंखों में ये खौफ भी साफ-साफ देखा की कहीं ज्यादा सख्ती,बेरूखी,अनुशासन बच्चे को गलत दिशा में तो ना धकेल देगा। इससे पहले की,कीमती वक्त की बचत का छद्म तर्क...फर्जी डिग्री की कीमत पर कामयाबी,चरित्र पतन की फिसलन पर कदम रखने की आतुरता का अंत स्याह ही होगा.. बच सको तो बच लो...और हमें भी बचा लो।


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