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पत्रकारों पर हमले- ख़बरों से ख़ौफ़ क्यों ?

Reported By: Pushpraj Sisodiya, Edited By: Pushpraj Sisodiya

Published on 25 Jun 2015 12:31 AM, Updated On 25 Jun 2015 12:31 AM

पत्रकारिता अगर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है तो पत्रकार इसका एक सजग प्रहरी है। देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पत्रकारिता आज़ादी के बाद भी अलग-अलग परिदृश्यों में अपनी सार्थक जिम्मदारियों को निभा रही है। लेकिन मौजूदा दौर में पत्रकारिता दिनोंदिन मुश्किल बनती जा रही है। जैसे-जैसे समाज में अत्याचार, भ्रष्टाचार, दुराचार और अपराध बढ़ रहा है, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।दरअसल, मीडिया और पत्रकारों पर हमला वही करते हैं या करवाते हैं जो इन बुराइयों में डूबे हुए हैं। ऐसे लोग दोहरा चरित्र जीते हैं। ऊपर से सफेदपोश और भीतर से काले-कलुषित। इनके धन-बल, सत्ता-बल और कथित सफल जीवन से आम जनता चकित रहती है। वो इन्हें सिर-माथे पर बिठा लेती है। लेकिन मीडिया जब इनके काले कारनामों की पोल खोलने लगता है तो ये बौखला जाते हैं और उन पर हमले करवाते हैं। पुलिस और शासन तंत्र भी इन्हीं का साथ देते हैं। बल्कि कई बार तो मिले हुए भी नजर आते हैं। दिखावे के तौर पर ज़रूर मामले दर्ज कर लिये जाते हैं, लेकिन होता कुछ नहीं।हाल ही में सामने आए मामले इसी की एक बानगी भर हैं। पिछले दिनों उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह को जिंदा जला दिया गया। जगेंद्र सिंह की मौत के मामले में फिलहाल दो केस दर्ज हैं, एक आत्महत्या का, जिसमें वो खुद अभियुक्त हैं और दूसरा उनकी कथित तौर पर हत्या का, जिसमें पांच पुलिस वाले और एक मंत्री अभियुक्त हैं। पुलिस वाले महज लाइन अटैच कर दिए गए हैं और समाजवाद का झंडा बुलंद किए नेताजी मंत्री पद पर बने हुए हैं। ये मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि मध्यप्रदेश के बालाघाट के एक स्वतंत्र पत्रकार संदीप कोठारी का अपहरण करने के बाद बेरहमी से उनकी हत्या कर दी गई और शव को जला दिया गया। संदीप स्थानीय भू-माफ़िया और बालू खनन माफ़िया के ख़िलाफ़ लगातार लिख रहे थे। ये हालात चिन्ताजनक हैं। खासकर, इसलिए कि पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में भारत विश्व के देशों में निरंतर पिछड़ता जा रहा है। दुनिया में मीडिया और पत्रकारों की सुरक्षा पर नजर रखने वाली ब्रिटेन की संस्था आई.एन.एस.आई. यानि इंटरनेशनल न्यूज सैफ्टी इंस्टीट्यूट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सबसे खराब पांच देशों की सूची में भारत पत्रकारों के लिए 'दूसरा सबसे खतरनाक' देश है। पत्रकारों से मारपीट, अपहरण और हत्याओं की पृष्ठभूमि की एक मात्र मंशा मीडिया की आवाज को दबाना है। सवाल उठना लाज़िमी है कि पत्रकारों के प्रति जिस तरह से हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, कहीं वो लोकतंत्र में असहमति और आलोचना की घटती जगह का सबूत तो नहीं। इन सभी मामलों में जो बातें सामने आई हैं वो ये कि हत्या और हमले का आरोप नेताओं, बाहुबलियों और पुलिस पर समान रूप से लगा है। मारे गए पत्रकारों ने प्रभावशाली लोगों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी और ये सभी स्वतंत्र पत्रकार थे, यानि उनके साथ खड़ा होने वाला कोई मज़बूत मैनेजमेंट नहीं था। निश्चित ही पत्रकार मुश्किल हालात में काम कर रहे हैं। शासन-तंत्र पत्रकारों की सुरक्षा करने में नाकाम रहा है।
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