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बचाना हो सम्मान तो केवल 'पात्रता' नहीं 'कौशल'पर दें ध्यान

Created at - July 1, 2015, 11:02 pm
Modified at - July 1, 2015, 11:02 pm

डॉक्टर्स डे पर देश भर में चिकित्सकों के सम्मान में कई आयोजन हुए,ऐसे ही एक बेहद गरिमामयी कार्यक्रम का मंच मैने भी संभाला।एक तरफ अपने पेशे के आदर्श को जीने वाले डॉक्टर्स के सम्मान का सिलसिला है तो दूसरी तरफ डी-मैट फर्जीवाड़े और व्यापमं घोटाले के आरोपियों की संदिग्ध मौत के पीछे साज़िश क्या है? डॉक्टर बनने और बनाने के फर्जीवाड़े में किस हद तक गिरा गया ? इसकी सुर्खियां भी हैं। सम्मान समारोह के मंच पर ऐसे डॉक्टर्स हैं जिनके काम देख-सुन कर आदर से सिर झुक जाए,तो दूसरी तरफ तमाम फर्जी तरीके अपनाकर किसी भी तरह नाम के आगे डॉक्टर लिखा लेने वाले सैंकड़ों आरोपियों की शर्म से झुकी सूरतें। मन में झंझावात उठा कि आखिर इसी नोबल प्रोफेशन में फर्जी तरीकों से दाखिले की होड़ क्यों?वजहें तो कई सारी हैं...महत्वाकांक्षा,केवल एक प्रोफेशन को ऊँचा मानने की सोच, रुपये-रसूख का गुरूर,दूसरे को देख-सुन कर लगी होड़...या फिर शायद डॉक्टर्स की आलीशान जीवन शैली का बाहरी आवरण लेकिन सारी वजहों को दिलो-दिमाग ने जब मथा तो दो शब्द निकले ELIGIBILTY और APTITUDE। एलिजिबिलिटी यानि पात्रता/काग़ज़ी योग्यता- वो योग्यता जो किसी परीक्षा में प्राप्ताकों का अनिवार्य आंकड़ा मात्र होता है। इसी को पा लेने मात्र से आप इस नोबल प्रोफेशन में दाखिल होने की काबीलियत सिद्ध कर लेते हैं। इन्हीं अंकों की मैरिट के आधार पर आपको उच्चतम संस्थानों में प्रवेश हासिल होता है। इसी पात्रता के लिए कुछ अपात्र धन सम्पन्न छात्रों द्वारा मुन्नाभाई शैली,डी-मैट,फेवर,पावर,मनी फोर्स किसी की हद तक जाया गया,बिना दूसरे शब्द पर ध्यान दिए,जो है APTITUDE/एप्टीट्यूट जिसे आप लियाकत,कौशल,तत्परता या वास्तविक मंशा कह सकते हैं।कौशल जो किसी कागज के टुकड़े से परिभाषित नहीं हो सकता,जो किसी और की जगह किसी और को काबिल नहीं बना सकता जो कागजी पात्रता होते हुए भी किसी में जबरन ठूंसा नहीं जा सकता। वो कुदरतन,हर किसी में,किसी खास प्रोफेशन के लिए मानसिकता के तौर पर ईश्वर प्रदत्त गुण है जो परीक्षा के परिणाम का मोहताज नहीं है। जैसे किसी दूसरे को पढ़ाने के लिए टॉपर होने से ज्यादा धैर्य से समझाने का गुण और डॉक्टरी पेशे के लिए एंट्रेंस एग्जाम में रैंक बनाने से ज्यादा सेवाभाव,उदारता,धीरज,आशावान और दयाभाव स्वाभाव का होना है। वो गुण जिनके लिए कोई काग़ज़ी कसौटी नहीं बल्कि पेशे में उतरने पर हर दिन-हर पल आने वाली व्यवहारिक चुनौती होती है। स्कॉलर लोग सेवाभावी ना होते हुए भी डॉक्टर बनते हैं,कामयाब भी कहलाते हैं...लेकिन कोरी योग्यता(एलिजिबिलिटी) और सही एप्टीट्यूट(सेवाभाव,धीरज,कौशल) बिना मशीनी डॉक्टर बनकर रह जाते हैं। जैसा हालिया दौर में कई बार नजर आता है। जिन्हें मरीज हर दिन झेलते हैं,जिनके हाथों छले जाते हैं,दुखी होते हैं..नतीजा उनकी हरकतों से पूरा डॉक्टरी पेशा बदनाम होता है। शक के दायरे में आकर वो नव-निर्दोष डॉक्टर्स भी शर्मिंदा होते हैं जिनके साथ में ऐसे फर्जी डॉक्टर्स पढ़े/रहे होते हैं। आज प्रोफेशनल सोच के साथ पढ़ाई में जुटे बच्चों में माता-पिता,शिक्षक और समाज अगर ये सोच शुरू से विकसित करें कि बच्चा किस प्रोफेशन का APTITUDE (कौशल,वास्तविक फितरत) रखता है तो वो युवा ना केवल उस पेशे में कागजी तौर कामयाब होगा बल्कि प्रैक्टिकली कहीं ज्यादा प्रोडक्टिव और समाज में ज्यादा योगदान देकर अपने लिए अविस्मरणीय स्थान बना पाएगा। तभी 'धरती के भगवान' वास्तव में केवल रोगों का नहीं बल्कि रोगी का संपूर्ण उपचार कर पाएंगे। आज फिर उन धन सम्पन्न मुन्नाभाईयों से करबद्ध प्रार्थना है कि साहब रुपयों के बल पर जबरन धकेल कर अपने बच्चों को इतनी शर्मिंदगी वाली राह क्यों देते हैं,उनमें भी कुदरत ने अद्भुत गुण दिया है। बच्चों को गुण सम्पन्न होने की,उन्हें केवल पात्रता नहीं वास्तविक योग्यता,सही APTITUDEपहचान कर उसी पर आधारित करियर चुनने की आज़ादी दीजिए ताकि वो आगे चलकर खुद को और पेशे को नई बुलंदियां दे सकें।


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