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बात 'मेरी जेब मेरा हक' की

Last Modified - July 8, 2015, 12:11 pm

आज बात मेरी जेब मेरा हक की.....कहने को तो ये महज एक कार्यक्रम का नाम है....जो IBC24 में शाम 6 बजे उपभोक्ताओँ की आवाज बनता है। । इस कार्यक्रम को करते करते मुझे अहसास हुआ कि वाकई एक बड़ा वर्ग उपभोक्ताओं का है और जिसके मन में अपने अधिकारों को लेकर ढेर सारी जिज्ञासा है, कार्यक्रम में गांव से लेकर शहर तक हर जगह के उपभोक्ता शामिल होते हैं....खासकर बस्तर अंचल की मौजूदगी हर दिन दर्ज होती है...जो बेहद पॉजिटिव संकेत हैं । हालांकि ये भी कटु सत्य है कि किसी गली की परचून की दुकान से लेकर बड़े बड़े मॉल्स तक उपभोक्ता सालों से शोषण का शिकार हो रहे हैं, हां कम से कम इस मामले में कोई भेदभाव नही है अमीर से लेकर गरीब तक और हर जाति वर्ग के लोग समान रुप से शोषित हो रहे हैं । कभी खरीदे गए सामानों की क्वालिटी को लेकर तो कभी उसके रेट(मूल्य) को लेकर । बड़े आश्चर्य की बात है कि हम बचपन से जागो ग्राहक जागो सुनते आ रहे हैं लेकिन जो प्रभाव और जागरुकता का प्रतिशत हमें पा लेना था वो हम नही पा पाए हैं । आज भी उपभोक्ताओं का बड़ा वर्ग अपने हक को लेकर जागरुक नही हैं, कंपनियां धड़ल्ले से लोगों के हक पर डाका डाल रही हैं और लोग जानते हुए या अनजाने में लूट का शिकार हो रहे हैं । ये लूट महज पैसों की नही बल्कि जनता के हेल्थ की भी है, जो कि बेहद घातक है । बात अगर सरकारी पक्ष की करें तो उपभोक्ता के पक्ष में कानून तो बेहद अच्छे नजर आते हैं लेकिन उसके प्रचार प्रसार और क्रियान्वयन को लेकर बेहद लापरवाही बरती जा रही है । यही वजह है कि कानून बने दशकों को हो गए लेकिन उपभोक्ता आज भी जागरुक नही हो पाया है । कई जगहों पर महीनों फोरम के अध्यक्षों की नियुक्ति ही नही होती । लोगों के मामले आम कचहरी के तरह महीनों सालों खिंच जाते हैं । एसे में एक तरफ तो जनता जागरुक नही हो....और दूसरी तरफ सरकारी लापरवाही....उपभोक्ता कानून की धार को भोथरा कर देती हैं । हालांकि इसमें उपभोक्ताओं की भी लापरवाही है...कुछ दर्शक हमें कॉल करते हैं और जब हम उनसे कहते हैं कि आप शिकायत दर्ज कराएं तो वो कहते हैं कि कुछ रुपयों के लिए क्या झमेले में पड़ें...सरकार ही क्यों नही कुछ करती....पर सवाल ये है कि सरकार हर जगह, हर समय मौजूद तो नही रह सकती इसीलिए उपभोक्ता का फर्ज भी है कि वो अपने साथ हो रहे अन्याय को लेकर जागरुक हो और शिकायत दर्ज कराए...क्योंकि उसका एक कदम सिर्फ उसका नही बल्कि उसके जैसे हजारों लाखों उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाता है । हाल ही में सामने आया मैगी विवाद एक बड़ा उदाहरण है कि कैसे लंबे समय तक लोगों के स्वास्थय के साथ खिलवाड़ होता रहा है । और उसका दूसरा पक्ष ये भी कि उपभोक्ता और सरकारें जागरुक हों तो कैसे चंद दिनों में मानकों में खरी ना उतरने वाली कंपनियां धाराशायी हो जाती हैं। कहने और लिखने का मकसद ये है कि उपभोक्ताओं को लेकर कानून तो बहुत हैं..लेकिन जागरुकता के अभाव में और सरकारी लापरवाही के चलते ये महज खानापूर्ति का कानून बनकर रह गया है। हालांकि इसका उजला पक्ष ये है कि जागरुकता का प्रतिशत बढ़ रहा है और मीडिया की भूमिका की वजह से फोरम के फैसले लोगों के सामने नज़ीर बनकर सामने आ रहे हैं लोग प्रेरित हो रहे हैं और अपनी जेब, अपनी हक को लेकर जाग रहे हैं ।

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