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"भ्रष्ट-तंत्र" में 'निर्लज्ज...लोक-लाज'

Created at - July 8, 2015, 8:46 pm
Modified at - July 8, 2015, 8:46 pm

पार्दशिता,शुचिता,संवेदनशीलता इन सारे शब्दों का सबसे ज्यादा इस्तमाल सियासी मंचों पर ही होता है और इन सभी शब्दों के 'स्वार्थ प्रेरित अर्थ' भी सियासतदां ही गढ़ते हैं। शांत,स्थिर,प्रगतिशील'देश का दिल'मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले की आंच जब दिल्ली नेशनल मीडिया तक पहुंची तो सबसे ज्यादा 'गिरहें'राजनैतिक शुचिता के ठेकेदारों की ही खुलीं। कौन सच्चा है,कौन किस हद तक घोटाले में लिप्त है,कितनी सच्ची जांच चल रही है और किसे सज़ा मिल रही है?इन सब में उलझी बहस से भरे पड़े हैं चैनल्स। लाजमी भी है आखिर 'सबसे आगे' रहने का दावा करने वाले चैनल के पत्रकार की संदिग्ध मौत ने घोटाले की जद में 'एडवांस दिल्ली मीडिया'को भी ला दिया।वर्ना रीजनल मीडिया तो सदा इस मुद्दे की गंभीरता को दिखा-सुना बताता रहा है। खैर,अब विपक्ष के आर-पार के संघर्ष के मूड और कद्दावर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस 'टर्निंग पॉइंट' को साफ-साफ दिखाना शुरू कर दिया है।मीडिया ने इसकी गंभीरता बताने के लिए इसे महा-घोटाला,खूनी घोटाला,ऐतिहासिक घोटाला जैसे कई नाम दिए लेकिन इस दौर का सबसे कचोटने वाला पहलू ये है,जिसमें प्रदेश सरकार के मुखिया कहते हैं कि उन्हें 'रात भर नींद नहीं आई...' तो दूसरी तरफ उन्हीं की सरकार के बहुत जिम्मेदार,कद्दावर मंत्री जिन्होंने पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारियां मिलने पर मंच से खुद को जमीन से जुड़ा कार्यकर्ता बताया,चंद घंटे बाद वो कैमरे पर बैखोफ़ ये कहतें दिखे कि 'पत्रकार-वत्रकार छोड़ो, हमसे बड़ा पत्रकार है क्या? जब एक ओर लागातार संदिग्ध मौतों के बाद केंद्रीय मंत्री कहती हैं कि -'उन्हें भी भय़ लगता है,जांच होना चाहिए' तो दूसरी ओर उसी पार्टी के प्रदेश के अति वरिष्ठ गृहमंत्री कहते हैं-'व्यापमं नहीं,लोकल मुद्दों पर बात करो...जो आया है वो तो जाएगा ही'। बेहद हैरान करने वाला होता है जब एक ओर प्रधानमंत्रीजी के सबसे करीबी केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि 'मामला गंभीर है,भय और शंका बढ़ाने वाला है,सक्षम ऐजेंसी से जांच करवानी जरूरी है'',तब अन्य कद्दावर केंद्रीय मंत्री कहते हैं- 'ये मुद्दा मूर्खतापूर्ण है,इस पर प्रधानमंत्री क्यों प्रतिक्रिया दें'।आमजन खासकर 'युवा' समझ नहीं पा रहा कि वो राज्य सरकार की 'बेदाग मासूमियत वाली पाक-साफ मंशा' पर कैसे भरोसा करे?इस दौर की सबसे बड़ी बहस के बीच प्रदेश की चिंता ये भी है कि आखिर प्रदेश के मुखिया के 'रात भर सो ना सकने की असल वजह क्या है' 24 घंटे में प्रधानमंत्री के 2-2 करीबी केंद्रीय मंत्रियों की 'जांच तो जरूरी है' वाले बयान,या साथी कैबिनेट मंत्रियों के ''बेतुके निर्ल्लज बोल''। ''लोकलाज'' का हवाला देकर यूं अचानक CBIजांच के स्व-लिखित पत्र के पीछे कारण क्या है- सुप्रीम कोर्ट में CBIजांच बावत लगी याचिकाओं की सुनवाई या फिर विपक्ष के आरोपों के अनुरूप प्रदेश सरकार की छवि-भंजन दौर से बच निकलने का एक 'छद्म कदम'। दुर्भाग्यजनक तो ये भी रहा कि मामले को उठाने वाले,ना केवल उठाने वाले कठिन परिस्थियों में RTIके जरिए एक-एक कर सुबूत जमा कर,पूरे करप्ट तंत्र की कलई खोलने वाले व्हिसिल ब्लोअर्स पर पर्सनल अटैक करना,उनकी निजी जीवन की खामियों को 'सीरीयस क्राइम' की शक्ल देना...ठीक वैसे ही हम पर दाग हैं तो आप भी बेदाग़ नहीं। एक आम युवा तो ये पूछ रहा है कि ''सरकार'' अगर आप वाकई पाक-साफ,संवेदी हैं तो क्यों नहीं इन भुक्तभोगी RTI कार्यकर्ता/व्हिसिल ब्लोअर्स के साक्ष्यों को खुद एग्जामिन कर,उन्हें पड़ताल में साथ लेकर उनकी शोध और सच्चाई के लिए सम्मानित किया ? यूं खामियां बताने वाले मीडिया या सुबूत जुटाने वाले RTI कार्यकर्ताओं पर ''साजिश का टैग'' लगाकर अपमानित करने से बेहतर होता कि दोनों को साथ लेकर दोषियों का पर्दाफाश करते। सरकार की छवि का तो पता नहीं लेकिन अब युवाओं का प्रदेश की भर्ती परीक्षाओं से उठा भरोसा शायद ही लौट पाएगा।


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