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'बेचारे बने होनहार' पूछें बस एक सवाल ?

Created at - July 18, 2015, 10:12 pm
Modified at - July 18, 2015, 10:12 pm

कौन नहीं चाहता कि वो अपने गृहराज्य,गृहनगर में रहकर अपनी क्षमता और एजुकेशन का इस्तेमाल करे। जन्म से समय,धन,श्रम लगाकर जब युवा अपनी एजुकेशन पूरी करता है और फिर जॉब के लिए अपने शहर या राज्य से बाहर जाता है तो खुद को दो हिस्सों में बंटा पाता है। एक तरफ होती है आगे बढ़ने की ललक तो दूसरी तरफ घर-परिवार की फिक्र। परिजनों को भी अपने बच्चे की तरक्की की कीमत उसके घर के बाहर रखकर आंखों से दूर रखकर चुकानी ही पड़ती है। बीते दिनों जब प्रधानमंत्री जी नें दुनिया भर के देशों में आधा दर्जन से ज्यादा यात्राओँ के दौरान लाखों भारतीयों को संबोधित करते हुए अक्सर ये कहा कि आप जहां भी रहें,अपने देश,अपने प्रदेश को ना भूलें तो सबके सिर आदर से झुक गए। अक्सर मिट्टी की याद दिलाने पर लोग भावुक हो गए। मोदी जी की नक्शेकदम पर चलने में सबसे आगे रहती है,मध्यप्रदेश की सरकार। जब प्रधानमंत्री जी ने मेक इन इंडिया शुरू किया तो यहां भी प्रदेश के सीएम साहब ने 'मेक इन मध्यप्रदेश' का नारा दिया। जब पीएम साहब ने विदेश में बैठे भारतीयों को देश की मिट्टी की याद दिलाई तो सीएम शिवराज जी ने भी अमेरिका समेत दुनिया भर में 'फ्रेंड्स ऑफ एमपी'(मध्यप्रदेश के मित्र) का मंच सजाया और वहां के रहवासी भारतीयों को मध्यप्रदेश लौटने का,निवेश करने का उन्हें प्रदेश की हित चिंता करने का न्यौता दिया। ऐसा कर वो पीएम की गुडबुक और प्रदेश की जनता की नजरों में काफी ऊपर आ गए। आखिर अच्छी मंशा और अच्छी पहल का स्वागत होना ही चाहिए। आज इन दोनों जननायकों से प्रदेश का युवा बस यही पूछ रहा है कि आज व्यापमं घोटाला,डीमैट घोटाला,मुन्नाभाई टाइप भर्ती और तमाम भर्ती घोटालों के बाद जब पूरे प्रदेश का नाम खराब हो रहा है,एक पूरी युवा जनरेशन की डिग्रियों,नौकरियों,नियुक्तियों पर शक होने लगा है । युवा डॉक्टर्स का तो सबसे बुरा हाल है उनसे अब उनके बैच (वो किस सन के पास-आउट हैं) के बारे में मरीज और उनके परिजन सवाल करने लगे हैं। वो युवा जो ईमानदारी से सारी उम्र पढ़ते रहे,परीक्षाओं में जी तोड़ मेहनत कर रैंक बनाते रहे और फिर भी आज धनकुबेरों के अपने बच्चों को रुपयों के बल पर कामयाब बनाकर उनके साथ खड़ा कर देने की कीमत चुका रहे हैं 'बेचारे'। वो पढ़ी-लिखी,मेहनतकश,ईमानदार,होनहार लेकिन फिर भी 'बेचारी युवा पीढ़ी' बस यही पूछ रही है कि घोटाला किसने किया,कौन कितना दोषी,किसने कितना खाया-छिपाया ये कौन सी जांच से समाने आएगा,किसे सजा मिलेगी इससे क्या उन होनहारों का ये कीमती वक्त,ये ऊर्जा,ये साल वापस आ सकेंगे क्या? इन हालात में युवाओं को घर लौटो,प्रदेश की चिंता करो और 'ब्रेन ड्रेन'यानि प्रतिभाओँ को पलायन रोकने के सारे प्रयास भी खोखले,बेमानी और पॉलिटिकल शिगूफा लगने लगे हैं। युवा पूछ रहे हैं,साहब कैसे ना जाएं बाहर और किस विश्वास से लौटें वापस...क्या आप मंचीय भाषण की प्रतिभा धनी सफेद पोश युवा पीढ़ी के प्रति कम होते विश्वास को लौटा सकते हैं,उनकी डिग्रियों,नियुक्तियों के प्रति उपजते शक को प्रदेश और प्रदेश के बाहर लोगों के मन से मिटा सकते हो ? अगर हां तो कब तक और किस कीमत पर और अगर नहीं तो फिर कैसे लौटेंगे 'फ्रेंड्स ऑफ MP'जब प्रदेश की हालिया पूरी युवा पीढ़ी पर फर्जी होने के शक ने उन्हें 'होनहार बेचारे' बना दिया है। राजनीति से परे युवाओं का "अच्छी सरकारों" की मंशा पर शक करने का कोई इरादा नहीं है लेकिन जब उनकी छांव तले,बनी हुई व्यवस्था से उपजे हालत ने उन्हें 'फर्जी तो नहीं है? ' के शक के घेरे में ला खड़ा किया है तो सवालों की कुछ उंगलियां तो बरबस उनकी ओर उठेगी ही।


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