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कौन सा वाला....'दोस्त'?

Last Modified - August 2, 2015, 7:23 pm

आज एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा हुआ...एक दुकानदार ने बड़ी मासूमियत से एक बेलोस सवाल पूछा और मैं निरुत्तर होकर सोच में पड़ गया क्या जवाब दूं उसे? हुआ कुछ यूं कि अगस्त के पहले रविवार को सारी दुनिया की तरह मैने भी अपने मित्रों को यानि फ्रेंडशिप डे की बधाई देने के लिए एक गिफ्ट गैलेरी का रुख किया। जाते ही ग्रीटिंग कार्ड्स और गिफ्ट कॉर्नर्स पर इतना रश था कि सोचा सीधे सेल्स बॉय से मदद लेना ही बेहतर है। सिंपली सेल्स मैन से कहा एक बेहतर ग्रीटिंग कार्ड दीजिए जिस पर उसने पूछा कौन सा वाला दोस्त ? आया कि इस सवाल का जवाब क्या दूं ? भांपते ही उसने फिर पूछा सर, कौन सा वाला दोस्त ? ऑफिस वाला की,बचपन वाला,स्कूल वइस सवाल ने मुझे हैरान कर दिया,बहुत दिनों बाद किसी कार्ड गैलेरी में गया था तो ये समझ नहीं आया कि इस सवाल का जवाब क्या दूं ? भांपते ही उसने फिर पूछा सर, कौन सा वाला दोस्त ? ऑफिस वाला की,बचपन वाला,स्कूल वाला कि कॉलेज वाला,लड़के वाला कि लड़की वाला ? दोस्त वाला दोस्त या प्यार वाला दोस्त ? मैं वाकई निरुत्तर और हैरान था क्योंकि दोस्तों का ये डिसक्रिपशन,ये क्लासीफिकेशन कभी मन में आया ही नहीं था। या यूं कहें की कभी इस विषय में इतना सोचा नहीं। आज के दौर में बड़े कैजुएली हम दोस्त,मित्र,डियर जैसे शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं पर इसी दौर में,इन्हीं शब्दों ने दोस्तों की इतनी कैटेगरी मार्केट को दे दी हैं ये कभी सोचा नहीं। बहुत सोचें तो भी मन में दोस्त और सहकर्मी बस यहीं कैटेगरी ध्यान आती हैं क्योंकि रोजाना अब बहुत से लोगों का ज्यादातर वक्त अपने कर्मक्षेत्र/ऑफिस में बीतता है,तो बड़ा स्वाभाविक है कि उनसे मेलजोल,बोलचाल,हंसी-मजाक,गिले-शिकवे,नौक-झौंक और सुख-दुख शेयर करना होती हैं,जो कायदे से मित्रों के साथ शेयर किये जाते हैं लेकिन फिर भी इतनी कैटेगरी इससे बन सकती हैं सोचा नहीं। वैसे भी हर पीढ़ी से अगली पीढ़ी कहीं ज्यादा स्मार्ट होती है शायद रिश्तों और व्यवहारिकता में भी अगली पीढ़ी इतनी आगे निकलती जा रही है कि वो पूरी तरह स्पष्ट है कि उसे किस वक्त किस तरह के मित्र की जरूरत है और यही जरूरत बाजार ने अपने प्रोडक्ट में ढाल कर बाजार में भिन्न-भिन्न कैटेगरी बना दी हैं। व्यक्तिगत स्तर पर इसमें कोई बुराई भी नहीं है पर ये भी उतना ही सही है कि अक्सर सहकर्मियों को,रूममेट्स को ,किसी लर्निंग सेशन में बैचमेट्स को या फिर सहयात्रियों को मित्र समझकर अधिकार जताने या राज़ बताने से कई बार रिश्तों में बड़ी उलझने भी पैदा हो जाती हैं। बहुत महीन लकीर से सही पर ये तय करना,क्लीयर होना बहुत जरूरी है कि आपका वास्तविक मित्र कौन है और सहकर्मी कौन है । दोनों से भले ही व्यवहार में,बोलचाल में समानता लगती हो पर उसकी सीमाएं और ट्रीटमेट में भिन्नता जरूरी है वर्ना तकलीफ की वजह बनता ही है। कुल जमा ये कि खुद से ये सवाल अक्सर पूछते रहना चाहिए कि वास्तव में मित्र कौन है,यानि कौन सा वाला है ? क्योंकि वास्तविक मित्र की परिभाषा तो बड़ी सरल लेकिन व्यापक है। जिससे आप बेबाकी से सबकुछ शेयर कर सकें,जिससे बोलने से पहले सोचने की जरूरत ना पड़े,जिसे बताकर उस बात के खुल जाने का भय ना हो,जिससे नफा-नुक्सान का गणित ना जुड़ा हो,जिसके सामने आप सर्वाधिक वास्तविक रूप में रह सको...मुमकिन है कि इन सब दायरों में कोई भी हो सकता है,सहकर्मी,बचपन का साथी,क्लासमेट,रुममेट लेकिन हर कोई इन दायरों में फिट हो ये कतई नहीं हो सकता। इसीलिए जरूरी है कि पहले से अपनी सीमाओँ को पहचान कर व्यवहार किया जाए। वैसे मेरे पास तो ऐसे सच्चे मित्र हैं और मुझे यकीन है आपके पास भी कम से कम एक 'सच्चा मित्र' तो अवश्य होगा...अब कौन सा वाला है ???....ये आप सोचिएगा जरूर.. HAPPY FRIENDSHIP DAY ALL

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