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मूवी रिव्यू: 'इरादा'

Last Modified - March 28, 2017, 2:44 pm

फिल्म- इरादा
निर्देशक- अपर्णा सिंह
कलाकार- नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी, सागरिका घाटगे


फिल्म में कहानी है एक बड़ी केमिकल कम्पनी की जिसकी जहरीली गैसों का पानी रिवर्स बोरिंग के जरिए जमीन के काफी नीचे तक छोड़ा जाता है। इसकी वजह से ज़मीन के नीचे के पानी में खतरनाक रसायन मिल जाते हैं। इस पानी को पीने से लोगों को कैंसर हो जाता है।

जिसका शिकार आर्मी से रिटायर्ड पिता परबजीत वालिया (नसीरुद्दीन शाह) की बेटी रिया (रुमान मोल्ला) भी हो जाती है। एक दिन उस कम्पनी में अचानक ब्लास्ट हो जाता है जिसकी जांच के लिए एक इंटेलिजेंस ऑफिसर (अरशद वारसी) आता है। जांच के दौरान ऑफिसर को रिवर्स बोरिंग के अलावा और भी कई चौंकाने वाले राज़ मिलते हैं। पूरी फिल्म इसी प्लॉट के इर्द-गिर्द घूमती है।

भटिंडा (पंजाब) में एक कैंसर ट्रेन चलती है, जिसमें बैठ कर कैंसर के मरीज सस्ते इलाज के लिए बीकानेर जाते हैं। इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कैंसर का प्रकोप है, जिसकी वजह है कीटनाशकों का भारी मात्रा में इस्तेमाल और फैक्ट्रियों के कचरे के जानबूझ कर किए गए गलत निस्तारण से पीने के पानी का प्रदूषित होना।

अपर्णा सिंह निर्देशित फिल्म 'इरादा' दूसरी वजह पर फोकस करती है। पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े इस तरह के मुद्दे को थ्रिलर के रूप में पेश करना चौंकाता है और बांधे भी रखता है। पर 'ईको थ्रिलर' और 'ईको टेररिज्म' जैसे जुमलों से अपनी मार्केटिंग कर रही इस फिल्म की अपनी कमजोरियां भी हैं, जिनकी वजह से यह समीक्षकों के हाथों से सितारे छीन कर ले जाते-जाते रह जाती है। ऐसा लगता है कि इसे बनाने से पहले रिसर्च तो काफी किया गया होगा, पर फिल्म के स्क्रीनप्ले और निर्देशन में कमी रह गई।

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है इसका विषय। हॉलीवुड में इस तरह के विषय पर जूलिया रॉबट्र्स की 'एरिन ब्रॉकविक' सहित कई फिल्में बन चुकी हैं। इस तरह के विषयों को और भी हिन्दी फिल्मों में भी उठाया जाना चाहिए, क्योंकि जिस तेजी से प्रदूषण लोगों की जान ले रहा है, उसे देखते हुए फिल्में इसे लेकर जागरूकता फैलाने के मामले में अहम भूमिका निभा सकती हैं। कैंसर के मरीजों से भरी ट्रेन में इंश्योरेंस एजेंटों के लच्छेदार बातें करने जैसे दृश्य डराते हैं और अंदर तक झकझोरते हैं।

नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी की जादुई केमिस्ट्री 'इश्किया' और 'डेढ़ इश्किया' के बाद इस फिल्म में एक बार फिर देखने को मिलती है। नवाज देवबंदी के 'जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है!' जैसे शेर नसीर की जुबां में एक अलग ही असर जगाते हैं और बहुत कुछ कह जाते हैं जिनके मतलब तलाशना एक अलग रोमांच का एहसास कराता है। बेटी को फाइटर पायलट बनाने के लिए ट्रेनिंग दे रहे रिटायर्ड फौजी और उसकी मौत के बाद एक रहस्यमय लेखक के किरदार को नसीर ने उसी सहजता के साथ निभाया है, जिसकी उनसे उम्मीद थी।


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