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बस एक क्षण कीजिए विचार - 'आज़ाद' हुए क्या !!!

Created at - August 15, 2015, 11:52 pm
Modified at - August 15, 2015, 11:52 pm

आज़ादी की वर्षगांठ पर सुबह से बधाई संदेशों से आपका भी दिन भरा रहा होगा। सुबह देशभक्ति गीतों के स्वर,नेताओं की ओजस्वी स्पीच,शहीदों की शौर्य गाथा से गर्वित मन ने दिन भर फील गुड कराया होगा।बड़ा अच्छा लगा जब सोचा कि हम कितने मुश्किल हालातों को पार कर समर्थ और ताकतवर देश बनने की दिशा में अग्रसर हैं। थोड़ा करीब से सोचें तो अपने-अपने करियर की जद्दोजहद में भी हम कुछ सफलताओं में सुविधाजनक अंदाज में अक्सर सोचते हैं कि हम 'आज़ाद' हैं लेकिन एक बार,बस एक बार एकांत में खुद को बारीकी से टटोंलें की क्या वाकई सच में आजाद हैं हम ? ना...ना...आप ये ना सोचिये की आज़ादी के औचित्य पर सवाल उठाकर कोई बेकार की बहस का हिस्सा बन रहा हूँ । पर हां,आज के दौर में जब समाज का एक तबका जीनव कैसे जिया जाए,सफलता कैसे पाई जाए और लोक-परलोक कैसे सुधारा जाए इस पर धन,श्रम और वक्त का बड़ा हिस्सा इन-'वेस्ट' करता है तब एक छोटा सा इंट्रोस्पेक्शन/आत्मअवलोकन तो बनता है कि क्या वाकई आज़ाद हैं...हम ? खबरों की दुनिया में रहते हैं तो हर तरह के क्राइम की जड़ में किसी ना किसी तरह की गुलामी आज भी ज़िंदा दिखती है। मसलन बेटे के मोह की गुलामी,कन्या भ्रूण हत्या करवाती है। दहेज के लालसा की गुलामी बहुओं की हत्या करवाती है। वासना और तृष्णा की गुलामी जिंदगियों को उपभोग यंत्र बनाती है। बिना मेहनत केवल कागजी योग्यता पा लेने की चाह की गुलामी फर्जी डिग्रियों के काण्ड कराती हैं। अँधश्रद्धा,अँधविश्वास,कुरीतियां,अवांछित मान्यताओं की गुलामी भी आडंबर,कर्मकाण्ड और पाखंड का पाप कराती हैं। इसके अलावा आलस्य,कामचोरी,लालच,ईर्ष्या,द्वेष,भौतिक सुखों की अंध लालसा भी तो गुलामी है जिसने सभी के जीवन को रेस्टलैस और सतत भागते रहने वाले चक्र में उलझा रखा है। निंदा,दूसरों की लकीर को छोटा दिखाना,किसी के अच्छे काम का प्रशंसा ना करना,दूसरों की उपेक्षा करना भी तो कहीं ना कहीं उस मन की गुलामी है जो अच्छे-बुरे का सारा भेद समझते हुए भी अंजान और निश्चछल और निर्मल बताकर धोखा देते हैं। वैसे ये सब विचार मन में तभी आ सकते हैं,ये मंथन तभी किया जा सकता है जब दैनिक कार्यों की व्यस्ता की मजबूरी से, भौतिक सुखों की गुलामी से मुक्ति पाकर,अपनी तरक्की की दशा छोड़ कर किस दिशा में जा रहे हैं उस पर थोड़े समय मंथन किया जाए। वैसे अंधेरे की गुलामी को खत्म करने के लिए एक छोटी सी किरण ही काफी है सो पूरा दिन,पूरा महीना,पूरा साल ना सही...एक घंटा,बस कुछ दिन,चंद क्षण तो निकाले जा सकते हैं अपने ही जीवन की गुलामी को दूर करने के लिए। अब अपने ख्यालों की आजादी के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा । हो सकता है तक शायद सही मायने में खुद को मुस्कुरा के कह सकेंगे - जश्न-ए-आजादी मुबारक हो।


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