रायपुर News

बस्तर की सड़क की सर्वाधिक कीमत चुकानी पड़ती है,क्योंकि यह सड़क पैसे से नहीं जवानों के खून से बनती है


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कहते हैं, कि बस्तर की सड़क की सर्वाधिक कीमत चुकानी पड़ती, क्योंकि यह सड़क पैसे से नहीं बल्कि जवानों की खून से बनती है, हकीकत में यह जमीनी सच्चाई भी है। बीते 3 दशक में माओवादियों ने कई राष्ट्रीय राजमार्गो और नेशनल हाईवे तक पर कब्जा कर रखा है, स्टेट हाईवे वर्षो से बंद पड़े हैं, जिन्हें सरकार अब बनाने की कोशिश कर रही है और माओवादी इसके निर्माण को रोकने की ।

विकास का रास्ता सड़कों से होकर जाता है और दशकों से देश के सबसे पिछड़े इलाके में शुमार बस्तर सड़कों के लिए तरसता रहा है । यहां के कई इलाके सालों से माओवादियों के कब्जे में हैं, जहां वो सड़क के निर्माण को रोकने के लिए पूरी ताक़त लगा देते हैं । माओवादियों ने सोची समझी रणनीति के तहत बीते 3 दशकों से बासागुड़ा-अरनपुर-जगरगुण्डा-गोलापल्ली-लक्ष्मीपुरम, दोरनापाल-जगरगुण्डा, बासागुड़ा-पामेड़ और अंतागढ़-नारायणपुर, नारायणपुर-ओरछा जैसी राजकीय राजमार्गों को पूरी तरह कब्जे में रखा है ।

अंदरूनी इलाकों में बनी सड़कें भी पूरी तरह से माओवादियों के कब्जे में हैं, और ये उन्होंने इसलिए किया क्योंकि उन्हें घने जंगल में नया गोरिल्ला जोन तैयार करना था, यहां वो सरकार की दखल नहीं चाहते, बल्कि समानांतर सत्ता चाहते हैं । यही वजह है कि माओवादी सड़कों का विरोध करते हैं, उनके विरोध के पीछे तर्क ये है कि सरकार यहां व्यापारियों के लिए सड़क बनाना चाहती है ।

क्या वाकई ऐसा है कि सड़कें सिर्फ व्यापारियों के लिए बनाई जा रही हैं. क्योंकि उसी सड़क पर आम लोग भी तो चलते हैं । गांव शहरों से जुड़े हैं. ग्रामीण शहर पहुंच पाते हैं, बच्चे स्कूल जा पाते हैं. डॉक्टर, शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अधिकारी गांव तक जा पाते हैं. दरअसल माओवादी गांव के लोगों के लिए खुद ही रहनुमा बने रहना चाहते हैं ।

बस्तर में अब भी 4 हजार स्क्वेयर किमी का ऐसा घना जंगल है, जहां कभी सड़कें बनी ही नहीं, सरकार अब भी केवल सीमित इलाकों में सड़के बनवा पाई हैं. और यहां भी माओवादी इन्हें बनने नहीं दे रहे है । आजादी के इतने सालों बाद भी. बस्तर के जो इलाके शेष भारत से पूरी तरह कटे हुए हैं. क्या उन तक कभी सड़कें पहुंचेगी..ये एक बड़ा सवाल है ।

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