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खंडवा पहुंचा नर्मदा-चंबल जनकारवा, जनता ने साझा की कई समस्याएं 

Last Modified - May 23, 2017, 7:10 pm

 

मध्यप्रदेश के पूर्व निमाड़ का सबसे बड़ा जिला खंडवा आजादी के छह दशक बाद भी विकास की बांट जोह रहा है। खंडवा जिले में इंदिरा सागर बांध, ओंकारेश्वर बांध बने और यहां के तीन सौ से अधिक गांवों का विस्थापन हुआ। खंडवा जिले के सबसे बड़े कस्बे हरसूद को 2004 में विस्थापित कर इंदिरा सागर बांध की जद में डुबो दिया गया। खंडवा ने विस्थापन के दंश के साथ ही ऐसे कईं पड़ाव देखे जिससे वह समय-समय पर विकास से पिछड़ता चला गया लेकिन विकास की बुनियाद रखने का दावा करने वाले सियासी दलों ने कभी जिले के बाशिंदों के त्याग का सम्मान नहीं किया।

आजादी के बाद से अब तक कईं सरकारें आई और चली गई। अंग्रेजों के जमाने से खंडवा जंक्शन बना और यहां का रेल पथ सीधे मुंबई से दिल्ली को जोड़ता है। बीते जामने से ही रेल पथ से जुड़ने के बावजूद यहां विकास की बात बेमानी रही। खंडवा ने पंडित भगवंतराव मण्डलोई, ठाकुर शिवकुमारसिंह चैहान, नंदकुमारसिंह चैहान अरूण यादव जैसे कईं नामचीन नेताओं को सियासी गद्दी पर बैठाया लेकिन अफसोस कि यहां पर आज भी बेरोजगारी की समस्या जस की तस बनी हुई है। खंडवा में मुख्य रूप से सोयाबीन, अरबी और प्याज की खेती की जाती रही है। कृषि आधारित जनसंख्या को सिंचाई के लिए पानी कभी ना मिला। इंदिरा सागर बांध बना तो तत्कालीन मंत्री सुभाष यादव नहरें खरगोन जिले में ले गए। ओंकारेश्वर बांध बना तो उसकी नहरें भी बड़वानी तक जा पहुंची लेकिन खंडवा को नहरों से लाभ ना मिल सका। जिले के पंधाना और छैगांवमाखन विकासखंड के किसान अब भी पानी के लिए तरस रहे हैं सिंचाई तो दूर उनको गर्मी में पीने का पानी भी नहीं मिल रहा है। हरसूद को विस्थापन के बाद रोजगार नहीं मिला। खालवा में कुपोषण से दर्जनों मौतें हुईं और देश भर में इससे कुख्यात हो गया। नर्मदा जल के नाम पर केन्द्र ने सौ करोड़ रूपए की राशि खंडवा को प्रदान की लेकिन एक सौ पच्चीस करोड़ खर्च करने के बाद भी दस साल में नर्मदा का पानी खंडवा के कंठों की प्यास ना बुझा सका। खंडवाशहर में संकरी सड़कें, अव्यवस्थित यातायात और बेतरतीब लगते बाजार यहां की दुर्दशा को बयां करते हैं। कुल मिलाकर खंडवा ने विकास की राह में अब भी खंडवा पिछड़ा ही रहा है।

 


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