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जाति बताओ मुर्दे की... दो गज जमीन को तरसती इंसानियत

 

जाति के बहुतेरे मुद्दे आपके सामने आए होंगे... आपने बहुत  से मुद्दों पर अपनी राय भी रखी होगी...गुस्सा भी जाहिर किया होगा... लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मरने के बाद दो गज जमीन के लिए भी जाति देखी जाती है। मामला पन्ना की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत इटवाकला के ग्राम मड़ैयन का है.. जहां मुक्ति धाम तो नहीं है लेकिन उन लोगों के लिए मुसीबत जरूर है जिनके पास दो गज जमीन भी नहीं है... और बात इससे भी ज्यादा चिंताजनक तब हो जाती जब जातियों के आधार पर जमीन मुहैया कराकर लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता है। फिर इस छोटी सोच को थोड़ा बड़ा करने के लिए कितने ही उत्थान के कार्यक्रम क्यों न चलाए जा रहे हों... करोड़ों रुपए पानी का तरह क्यों न बहाए जा रहे हों लेकिन फिर भी मुर्दे की जाति तो पूछी ही जाएगी। 

दरअसल जाति का ये विभत्स मामला तब सामने आया जब विश्वकर्मा जाति के एक लड़के की मौत हुई तब उसके भाई ने ये बात उठाई की गांव मे कोई मुक्ति धाम नहीं है ...कई बार सरपंच से कहे जाने पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई और अगर किसी के पास यहां जमीन नहीं है तो उसे अपने मृतक परिजनों को अपनी ही जाति की जमीन में जलाना होगा। 

अब सवाल ये कि मंत्री कुसुम महदेले जो अपने विधानसभा क्षेत्र में मुक्ति धाम बनवा नहीं सकी या वे अपने क्षेत्र की समस्यों को जानती ही नहीं है। सवाल यह भी है कि कहा है वे बड़े प्रशासनिक अधिकारी जिनके कंधो पर जिले मे ऐसी समस्याओं को दूर करने की जिम्मेदारी है ...और कहा गया वो विपक्ष जिनके नेता जो वोट मांगते वक्त जाति के नाम पर सरकार को घेरने का एक चूक नहीं करते। 

वैसे आप सोच रहे होंगे की अभी तक आश्वासन क्यों नहीं आया तो वह भी आ चुका है....लेकिन जरा सोचिए उन ग्रामीणों की जिन्हें ऐसे उल जलूल नियमों मानने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यहीं है संस्कारी भारत के भयवाह जातिवाद की सच्चाई। 

 

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