भोपाल News

नर्मदा नदी को लेकर कानून बनाने में क्यों बैकफुट पर मध्यप्रदेश सरकार ?

Last Modified - August 3, 2017, 10:57 am

 

जीवनदायिनी नदी मां नर्मदा को कानूनी रूप से जीवित इकाई का दर्जा देने के मामले में मध्य प्रदेश सरकार बैकफुट पर नजर आ रही है.. 3 मई को GST के लिए बुलाए गए विधानसभा के विशेष सत्र में नर्मदा को जीवित इकाई का दर्जा देने का पर्यावरण मंत्री अंतर सिंह आर्य ने संकल्प जरूर पेश किया था.. लेकिन उसके बाद सरकार मानसून सत्र में इसे कानूनी रूप देने के लिए कोई विधेयक नहीं लाई.. इसमें लीगल इश्यू की अड़चन बताई जा रही है। ऐसे में अपने वायदे को पूरा न करने को लेकर सीएम शिवराज और प्रदेश सरकार दोनों पर सवाल उठ रहे हैं। 

नर्मदा संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश सरकार की ओर से निकाली गयी नर्मदा सेवा यत्रा अब राजनीतिक यात्रा ही साबित हो रही है. दरअसल सरकार ने जीवनदायिनी नदी मां नर्मदा को कानूनी रूप से जीवित इकाई का दर्जा देने की घोषणा पर अमल नहीं किया. 3 मई को विधानसभा के विशेष सत्र में पारित हुआ शासकीय संकल्प मानसून सत्र में आगे नहीं बढ़ पाया. कानून बनाने के लिए सरकार का विधेयक लाने का वादा पूरा नहीं हुआ.. इस मामले में बीजेपी सफाई देती नजर आ रही है.

दरअसल, नैनीताल हाईकोर्ट ने 20 अप्रैल को गंगा और यमुना नदी को जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी थी. कोर्ट के फैसले में दोनों नदियों को एक मानव की तरह संविधान की ओर से मुहैया कराए गए सभी अधिकार देने की बात कही गई थी. यानी नदी को जीवित व्यक्ति के सभी अधिकार होंगे और इसमें प्रदूषण फैलाने या नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ नदी के नाम से ही FIR दर्ज कराई जाएगी। वहीं, मध्य प्रदेश में ये कानून अमल में न आने पर अब विपक्ष सवाल उठा रहा है। 

नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान सीएम शिवराज ने विधानसभा के विशेष सत्र में कहा था कि नर्मदा को जीवित इकाई का दर्जा इसलिए दिया जा रहा है.. क्योंकि मां के प्रति बेटा और बेटी का भी फर्ज होता है। हम आज हैं, कल नहीं रहेंगे। हम ऐसा प्रबंध वैधानिक रूप से करना चाहते हैं कि जीवित होने पर व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने पर जो सजा मिलती है, वो नर्मदा नदी के साथ करने वालों को भी मिले। लेकिन नर्मदा सेवा यात्रा के बाद ये कानून न बनाने पर अब सरकार और शिवराज की मंशा पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

नर्मदा नदी को लेकर कानून बनाने में बैकफुट में मध्यप्रदेश सरकार ?

आइये अब आपको बताते हैं कि नर्मदा नदी को लेकर कानून बनाने में मध्य प्रदेश सरकार फिलहाल क्यों बैकफुट में है।  दरअसल नैनीताल हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में गंगा और यमुना को जीवित इकाई की मान्यता दी थी। जिसके खिलाफ उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। याचिका में कहा गया था कि कई राज्यों में बहने वाली नदियों को लेकर कदम उठाना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। इस पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 7 जुलाई को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। इसकी जानकारी मध्य प्रदेश सरकार को लगी तो उसने विधेयक के प्रपोजल को विधानसभा में आने से रोक दिया। मध्य प्रदेश सरकार चाहती है कि उत्तराखंड सरकार ने गंगा और यमुना के केस में जिन लीगल इश्यु को सुप्रीम कोर्ट में उठाया है उनका निराकरण हो जाए। बता दें कि संविधान के मुताबिक अंतराज्यीय नदियों के मैनेजमेंट रूल्स बनाने का अधिकार सिर्फ केन्द्र सरकार को है। गंगा-यमुना के साथ ये नर्मदा पर भी लागू होता है। एक मुद्दा ये भी है कि नदियों को जीवित का दर्जा देने से अगर इनमें बाढ़ आती है तो इससे होने वाले नुकसान पर संबंधित व्यक्ति क्या चीफ सेक्रेटरी के खिलाफ नुकसान की भरपाई का मुकदमा दाखिल कर सकता है.. और क्या राज्य सरकार को ऐसा आर्थिक बोझ वहन करना चाहिए?

 


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