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स्पेशल : भूदान आंदोलन के जनक विनोबा भावे की जयंती

 

देश में भूदान तथा सर्वोदय आंदोलनों के लिए पहचाने जाने वाले संत विनोबा भावे जनसरोकार वाले नेता थे। 11 सितंबर 1895 को कोलाबा जिले के गाकोडा गांव के एक ब्राहम्ण परिवार में जन्मे विनायक नरहरि भावे ही आगे चलकर विनोबा भावे के नाम से प्रख्यात हुए, कहा जाता है की विनोबा के आध्यात्मिक विकास पर उनकी मां रूक्मिणी देवी का गहरा प्रभाव था। विनोबा ने अपने शुरूआती दिनों में ही संत तथा दार्शनिकों को पढ़ना शुरू कर दिया था, परन्तु भावे की विशेष रूची गणित में रही। 1916 में अपनी इन्टरमीडियेट की परीक्षा देने निकले विनोबा भावे ब्रह्रं की खोज में बनारस जा पहुंचे, जहां उन्होने कई पौराणिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया बस यही से शुरू हुआ युवा विनायक नरहरि का विनोबा भावे बनने का सफर, वैसे तो भावे आध्यात्म से जुड़े रहे लेकिन उनकी चेतना समाज से जुड़ी थी इसी कारण संत होने के बावजूद भी उनमें राजनैतिक सक्रियता थी। महात्मा गाँधी से प्रभावित होकर विनोबा भावे ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम के लिए भी बहुत काम किया।

 

आजादी के बाद विनोबा भावे 

देश को आजादी मिलने और महात्मा गांधी की हत्या के बाद विनाबा भावे ने समाज सुधार आंदोलन की शुरूआत की। इस क्रम में भूदान तथा सर्वोदय आंदोलन बहुत प्रभावी रहे। सर्वोदय में विनोबा सबके उदय की बात करते थे उनकी इस सोच में वे लोग भी शामिल हुए जो निर्धन, दुखी तथा अशिक्षित थे। यह वह दौर था जब एक वर्ग जमीन का स्वामी होता था तथा दूसरा मजदूर इसी से दुखी विनोबा ने भूदान आंदोलन शुरू किया। उन्होंने दान में भूमि मांगना शुरू किया ताकि निर्धन दुखी लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की जा सके। इसी अभियान को सफल बनाने के लिए विनाबा भावे ने लगभग 20 हजार किलोमीटर की पद यात्रा की जिसकी बादौलत देशभर में करीब 40 लाख एकड़ से भी ज्यादा जमीन दान में मिली। भूदान अंदोनल के चलते देशभर के कई भूमिहीनों को भूस्वामित्व मिला आज भी भूदान आंदोलन के प्रणयता के रूप में उन्हे याद किया जाता है।

 

आपातकाल, विनोबा भावे और भारतरत्न

वर्ष 1970 में उन्होंने घोषणा की कि वे अब पवनार आश्रम में ही रहेंगे। साल 1974 से 1975 तक उन्होने एक वर्ष का मौन व्रत रखा। इसी दौरान देश का लोकतंत्र आपातकाल जैसी घटनाओं से गुजरा जिस पर मौन धारण किए विनाबा भावे की स्लेट पर लिखी टिप्पणी यह अनुशासन पर्व है काफी विवादों में भी रही लेकिन इसके परे देश उन्हे गीता सार सरलीकरण, सर्वोदय और भूदान आंदोलन के लिए ही याद करता है। उम्र के 87वें पढ़ाव पर पहुंच चुके विनोबा भावे अस्वस्थ रहने लगे। इसके बाद उन्होने देह त्यागने का निर्णय ले लिया इसके साथ ही उन्होने अन्न, जल तथा कोई भी औषधि लेने से इनकार कर दिया और 15 नवंबर 1982 को वह मृत्यु को प्राप्त हुए। मृत्यु उपरांत विनोबा भावे को सन 1983 में भारतरत्न अलंकरण से नवाजा गया।  

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