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फिल्म रिव्यु - कड़वी हवा

Last Modified - November 24, 2017, 5:16 pm

फिल्म- कड़वी हवा

डायरेक्टर-नीला माधव पंडा

कलाकार-संजय मिश्रा, रणवीर शौरी, तिलोत्तमा शोम

जोनर- सीरियस ड्रामा

रेटिंग-5/3

बॉलीवुड में इन दिनों रोमांटिक व एक्शन फिल्मों का ट्रेंड है. शायद इसलिए ही ज्यादातर डायरेक्टर्स अपने फैन्स के लिए लगातार ऐसी फ़िल्में बना रहे हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी डायरेक्टर हैं जो लीग से हटकर फ़िल्में बनाने का ज़ज्बा रखते हैं. इनका एक अलग दर्शक वर्ग है, जिन्हें कुछ नया पसंद है जो अक्सर कुछ नया ढूंढते हैं. डायरेक्टर नीला माधव पंडा इन्हीं में से एक हैं जिन्होंने ‘कड़वी हवा’ जैसी फ़िल्में बनाई है. जो कि क्लाइमेट चेंज पर बनी है. संजय मिश्रा और रणवीर शौरी की दमदार एक्टिंग इसे एक बेहतरीन फिल्म बनाती है.

कहानी- इस फिल्म की कहानी है एक अंधे पिता (संजय मिश्रा) की, जो एक सुखाग्रस्त गांव से ताल्लुक रखता है. जहां के किसानों की खेती बारिश के आभाव में चौपट हो चुकी है और वहां के किसान बैंक लोन के दबाव में आत्महत्या कर रहे हैं.इस अंधे पिता (संजय मिश्रा) का एक बेटा भी है ‘मुकुंद’, जिस पर भी बैंक का मोटा कर्ज है. अपने एकलौते बेटे को इस कर्ज के जाल से निकालने के लिए संजय मिश्रा बैंक के वसूली अधिकारी से एक अनोखी डील करता है ताकि उसके गांव में चल रही ‘कड़वी हवा’ से उसका बेटा बच जाए. लेकिन क्या एक अंधा बुजुर्ग पिता अपने एकलौते बेटे को बचा पायेगा? क्या है ये कड़वी हवा जो एक के बाद एक करके पूरे गांव को निगल रही है? और क्या ये कड़वी हवा मुकुंद को भी निगल लेगी? इन सभी सवालों के जवाब के लिए आपको पूरी फिल्म देखनी होगी.  जो कि 24 नवम्बर यानि आज रिलीज हुई है। 

 बॉलीवुड में अभी तक क्लाइमेट चेंज के गंभीर मुद्दे पर ऐसी फिल्म देखने को नहीं मिली है. फिल्म के निर्देशक नीला माधव पंडा ने पर्यावरण के गंभीर मुद्दे को ध्यान में रखते हुए फिल्म ‘कड़वी हवा’ बनाई है. जो लोगों को पर्यावरण के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर देगा. बता दें कि माधव पंडा ने ‘आई एम कलाम’ से अपना फ़िल्मी करियर डेब्यू किया था.

 इस पूरी फिल्म में संजय मिश्रा की दमदार एक्टिंग देखने को मिली है. उन्होंने एक अंधे बूढ़े बाप का किरदार बेहद संजीदगी निभाया. वहीं इस फिल्म के दूसरे अभिनेता रणवीर शौरी की एक्टिंग भी बेहद शानदार रही. दोनों ही अभिनेताओं ने एकदूसरे को एक्टिंग के मामले में कड़ी टक्कर दी है.

म्यूजिक- अगर गानों की बात करें तो फिल्म के अंत में गुलजार साहब की एक नज़्म है जो आपको बेहद पसंद आएगी. जिसे सुनकर आप काफी कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएंगे. फ़िलहाल इस पूरी फिल्म में जबरन मनोरंजन डालने की कोशिश नहीं की गई.

 

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