News

बाबरी मस्जिद गिराने के 25 साल ,शौर्य दिवस बनाम यौम-ए-गम

Last Modified - December 6, 2017, 1:21 pm

बाबरी मस्जिद विवाद अभी थमा नहीं है लेकिन विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने आज  बाबरी मस्जिद गिराने के 25 साल पूरे होने पर शौर्य दिवस के रूप में उसे याद करने का फैसला लिया है।6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी गई थी, जिसका मुकदमा आज भी लंबित है.वहीं, मुस्लिम संगठनों ने इस दिन यौम-ए-गम यानी दुख का दिन के तौर पर मनाने का एलान किया है.

ऐसे में किसी अनहोनी की आशंका से बचने के लिए केंद्र सरकार की एडवाइज़री के बाद अयोध्या और फैजाबाद में कड़ी सुरक्षा तैनात की गई है. पुलिस के साथ-साथ संवेदनशील इलाकों में सीआरपीएफ और आरएएफ की भी तैनाती की गई है. गाड़ियों, होटलों की तलाशी की जा रही है.वहीं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने मुस्लिम समुदाय से आज बाबरी विध्वंस की बरसी को शांतिपूर्ण ढंग से मनाने और मामले से सम्बन्धी सभी मुकदमों के जल्द निपटारे और विवादित स्थल पर मुसलमानों को कब्जा मिलने की दुआ के लिये विशेष आयोजन की अपील की है बीएमएसी के संयोजक ज़फ़रयाब जीलानी ने कहा है मुस्लिम समुदाय 6 दिसम्बर को विशेष प्रार्थना सभाओं का भी आयोजन करे जिसमें बाबरी विवाद से सम्बन्धित सभी मुकदमों का जल्द से जल्द फैसला हो.

ज्ञात हो की भारत के प्रथम मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर 1527 में इस मस्जिद का निर्माण किया गया था.पहले जो मंदिर था उसके पुजारियों से हिन्दू ढांचे या निर्माण को छीनने के बाद मीर बाकी ने इसका नाम बाबरी मस्जिद रखा.बाबरी मस्जिद के केंद्रीय स्थल पर करीब 50 हिंदूओं ने कथित तौर पर रामलला की मूर्ति रखी दी थी, जिसके बाद यहां उनकी पूजा अर्चना शुरू हो गई और यहां मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया.हाशिम अंसारी ने भी अदालत में याचिका दाखिल करके बाबरी मस्जिद में रखी मूर्तियां हटाने के आदेश देने का आग्रह किया था.हाशिम अंसारी ही इकलौते ऐसे शख्स थे जो 1949 में इस मस्जिद में रामलाल की मूर्तियां रखे जाने के गवाह थे. उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को खुद देखा था.

 वर्ष 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली.हजारों की संख्या में कार सेवकों ने  वर्ष 1992 में अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढहा दिया, जिसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए. और इस दंगे की आज बरसी शौर्य दिवस के रूप में मानना किसी दंगे को आमंत्रण देने के ही सामान है। क्योकि वर्ष 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस संबंध में फैसला सुनाया था.

न्यायालय ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया था, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी. 

Trending News

Related News