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छत्तीसगढ़ की काशी -खरौद

Created at - December 7, 2017, 7:47 pm
Modified at - December 7, 2017, 7:47 pm

खरौद छत्तीसगढ़ के पाँच ललित कला केन्द्रों में से एक और मोक्षदायी नगर माना जाने के कारण छत्तीसगढ़ की काशी कहा जाने वाले खरौद में एक दुर्लभ शिवलिंग स्थापित है। जिसे लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।  लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 120  कि॰मी॰ तथा संस्कारधानी शिवरीनारायण से 3  कि॰मी॰ की दूरी पर बसे खरौद नगर में स्थित है।  रामायणकालीन इस मंदिर के गर्भगृह में एक शिवलिंग है जिसमें एक लाख छिद्र हैं ! कहते हैं कि इनमें से एक छिद्र पाताल का रास्ता है लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ रामायण कालीन शबरी उद्धार और लंका विजय के निमित्त भ्राता लक्ष्मण की विनती पर श्रीराम ने खर और दूषण की मुक्ति के पश्चात 'लक्ष्मणेश्वर महादेव' की स्थापना की थी ! रतनपुर के राजा खड्गदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था ! विद्वानों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण काल छठी शताब्दी माना गया है। इस मंदिर के निर्माण के पीछे की कथा बड़ी ही रोचक है ! साथ ही इस मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह किया गया है कि सुनने वाले और सुनाने वाले को इस पर यकीन करना मुश्किल होगा ! इस मंदिर में शिवलिंग है, जिसमें एक लाख छिद्र हैं, इस कारण इसे लक्षलिंग कहा जाता है, इसमें से एक छिद्र पातालगामी हैं, जिसमें कितना भी पानी डाला जाए, उतना ही समाहित हो जाता है, छिद्र के बारे में कहा जाता है कि इसका रास्ता पाताल की ओर जाता है। 

 

इसके निर्माण की कथा यह है कि रावण का वध करने के बाद श्रीराम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा, क्योंकि रावण एक ब्राह्मण था ! इस पाप से मुक्ति पाने के लिए श्रीराम और लक्ष्मण रामेश्वर लिंग की स्थापना करते हैं ! शिव के अभिषेक के लिए लक्ष्मण सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों से जल एकत्रित करते हैं। 

इस दौरान वे गुप्त तीर्थ शिवरीनारायण से जल लेकर अयोध्या के लिए निकलते समय रोगग्रस्त हो गए ! रोग से छुटकारा पाने के लिए लक्ष्मण शिव की आराधना की, इससे प्रसन्न होकर शिव दर्शन देते हैं और लक्षलिंग रूप में विराजमान होकर लक्ष्मण को पूजा करने के लिए कहते हैं ! लक्ष्मण शिवलिंग की पूजा करने के बाद रोग मुक्त हो जाते हैं और ब्रह्म हत्या के पाप से भी मुक्ति पाते हैं, इस कारण यह शिवलिंग लक्ष्मणेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ.मंदिर के बाहर परिक्रमा में राजा खड्गदेव और उनकी रानी हाथ जोड़े स्थित हैं ! प्रति वर्ष यहाँ महाशिवरात्रि के मेले में शिव की बारात निकाली जाती है ! छत्तीसगढ़ में इस नगर की काशी के समान मान्यता है कहते हैं भगवान राम ने इस स्थान में खर और दूषण नाम के असुरों का वध किया था इसी कारण इस नगर का नाम खरौद पड़ा। 


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