प्रायोजित खतरों के मायने 

Reported By: Aman Verma, Edited By: Aman Verma

Published on 22 Jan 2018 10:40 AM, Updated On 22 Jan 2018 10:40 AM

जब से मोदी सरकार आई है, देश खतरे के दौर से बाहर नहीं निकल पा रहा है। धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की आजादी, सहिष्णुता और लोकतंत्र जैसे मूल्यों की लंबी फेहरिश्त है जिस पर पिछले चार सालों से खतरे के बादल छाए हुए हैं। वैसे धर्मनिरपेक्षता पर खतरा तो मोदी सरकार बनने की संभावना के समय से ही मंडराने लगा था। जब नरेंद्र मोदी चुनाव मैदान में थे तभी विरोधियों ने देशवासियों को आगाह करना शुरू कर दिया था कि- संभल जाओ ! वरना कहीं अगर ये शख्स जीत गया तो देश का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन देशवासियों ने मोदी विरोधियों के प्रायोजित डर को ठेंगा दिखाते हुए मोदी को प्रचंड बहुमत से देश की बागडोर सौंप दी। मोदी के कामकाज संभालने के बाद देश का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप कितना बना-बिगड़ा इसका अपना-अपना आकलन हो सकता है लेकिन हुआ ये कि खुद मोदी विरोधियों की धर्मनिरपेक्षता ही खतरे में पड़ गई। भगवा आतंकवाद का डर दिखाने वालों में ही भगवा रंग में रंगने की होड़ शुरू हो गई। आलम ये रहा कि कथित धर्मनिरपेक्षता का चोला उतार कर खुद को खालिस हिंदू साबित करने के लिए लोग कोट के ऊपर जनेऊ पहन कर घूमने लगे। 

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मोदी ने पद संभालते ही स्वच्छता अभियान छेड़ा। गली-चौराहों से लेकर सत्ता प्रतिष्ठानों तक चौतरफा सफाई शुरू हुई। सत्तर सालों से जमा कचरा बाहर निकाला जाने लगा तो देश में फिर खतरा मंडराने लगा। इस बार ये खतरा अभिव्यक्ति की आजादी पर आया। खतरे से देश को उबारने के लिए मोमबत्ती और अवार्ड वापसी गैंग ने मोर्चा संभाला और तब कहीं जाकर अभिव्यक्ति की आजादी बहाल हुई।  

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अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा खत्म हुआ भी नहीं था कि अब समूचा लोकतंत्र ही खतरे में पड़ गया है। बेचारगी की हद तो ये है कि लोकतंत्र के रक्षकों को ही लोकतंत्र खतरे में नजर आने लगा है और वे इसे बचाने की गुहार लगाने मीडिया की शरण में आने को मजबूर हो गए हैं। बवाल मचाने के बाद अब इन्हीं में से एक जज महोदय कह रहे हैं कि किसी बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है और न्यायपालिका का विवाद न्यायपालिका के अंदर से ही सुलझा लिया जाएगा। सवाल उठता है कि जब विवाद न्यायपालिका के अंदर से ही सुलझा लेना था तो इतना बखेड़ा खड़ा करने का मतलब क्या था। हास्यास्पद पहलू ये भी है कि लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देने वालों में वो दल भी शामिल है जिसके खुद के दामन पर आपातकाल के जरिए लोकतंत्र का गला घोटने का कभी ना मिटने वाला बदनुमा दाग लगा है। ये भी कम मसखरीनुमा मिसाल नहीं है कि भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह...इंशाअल्लाह...जैसे नारे लगाकर देश की अखंडता को खतरे में डालने वाली गैंग तक लोकतंत्र के खतरे में पड़ने का राग अलाप रही है। गोया डेमोक्रेसी ना हुई मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मी बहन हो गई जिसकी इज्जत हमेशा खतरे में रहती है।

 

 

सौरभ तिवारी, असिस्टेंट एडिटर, IBC24

 

Web Title : Article : Meaning of sponsored hazards

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