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घोटालों के युग में हम लोगों को टैक्स क्यों देना चाहिए?

Created at - February 21, 2018, 8:07 pm
Modified at - February 21, 2018, 8:07 pm

नई दिल्ली। शायद ही कोई दिन ऐसा होता है जब सरकार अखबारों और टेलीविज़न पर महंगे विज्ञापनों के जरिये हमें तय वक्त पर बकाया टैक्स, अग्रिम टैक्स भुगतान करने और ऐसा नहीं करने पर नतीजे भुगतने की याद न दिलाती हो। तब ये विज्ञापन हमसे–आपसे और मुझसे- ये भी कहते हैं कि इस राशि का इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण योजनाओं में किया जाता है और हमें राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बनना चाहिए। आपसे और मुझसे ये भी कहा जाता है कि इस रकम का इस्तेमाल भारत की सुरक्षा सुनिश्चित कर हमारी सुरक्षा में किया जाता है। हमें ऐसा महसूस कराया जाता है कि अगर हमने वक्त पर भुगतान नहीं किया तो हम देशद्रोही हैं। हमें ये महसूस कराया जाता है कि देश की सुरक्षा पर इसका असर पड़ सकता है और इसके लिए हम जिम्मेदार होंगे।

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ऊपर्युक्त सभी सही हैं और ये भी कि सरकार टैक्स से जमा रकम के इस्तेमाल के बारे में बताने की कोशिश कर रही है, लेकिन सिर्फ एक सीमित हद तक।हां, ये तथ्य है कि सरकार वक्त पर जमा टैक्स और स्वस्थ खजाने के आधार पर चलती है। खजाना स्वस्थ रहे इसके लिए जुटाए गए टैक्स का इस्तेमाल प्रभावी और सही तरीके से किया जाए। कोई भी सरकार अपनी जनता का विश्वास अगर बनाए रखना चाहती है तो ये सर्वोच्च शर्त होती है।

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क्या भारत में टैक्स से जुटाए पैसों का इस्तेमाल प्रभावी तरीके से होता है? क्या इस पैसों का सही तरीके से सरकार के कार्यों के प्रबंधन और फंड्स के वितरण में इस्तेमाल किया गया? हर कोई ऐसा होने की उम्मीद करता है, लेकिन ये कहना पड़ेगा कि जब से सरकार ने समाज के सोशलिस्ट पैटर्न को प्रोत्साहन देना तय किया, टैक्सपेयर्स की मेहनत से जुटाया गया फंड पानी में मिल गया। सीधे शब्दों में कहा जाए तो जरूरतमंदों की मेहनत की कमाई लालची लोगों की कभी न खत्म होने वाली जरूरतों को पूरा करने में लग गई।

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सरकार ने 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण गरीबों की सेवा के मकसद से किया, लेकिन इसका लक्ष्य श्रीमती इंदिरा गांधी की अल्पमत की सरकार बचाना था। वो सरकार कम्युनिस्टों और वामपंथियों के समर्थन पर टिकी थी। सरकार को बचाने के लिए तत्कालीन सरकार ने सिर्फ बैंकों का राष्ट्रीयकरण ही नहीं किया, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को लाइसेंस परमिट राज की ओर भी मोड दिया, एक ऐसी व्यवस्था जिसमें बिना सरकार की मंजूरी के कुछ भी नहीं किया जा सकता था, इससे मुट्ठी भर लोगों के हाथ में अनियंत्रित शक्ति आ गई।

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पिछले एक दशक में चाहे कांग्रेस की सरकार हो या बीजेपी की, टैक्स पेयर्स के पैसों में से 2.6 लाख करोड़ रुपये राष्ट्रीयकृत बैंकों में झोंक दिए जिन्हें सफेद हाथी कहा जाता है। इससे साबित होता है कि सरकारें लगातार इन बैंकों के प्रबंधनों पर सतर्क निगाह रखने में नाकाम रही हैं। राजनीतिक पसंद बैंकों के प्रबंधनों के बोर्ड में नियुक्त किए जाते रहे और इसका नतीजा ये है जो हम सभी देख रहे हैं। राजनीतिज्ञ अपने उद्योगपति कारोबारी मित्रों और समर्थकों की सुविधा के लिए बड़ी मात्रा में राशि का इंतजाम कराते रहे और इस प्रक्रिया में भारतीय बैंकों का खजाना खाली होता गया।

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जनता के पैसों की इस लूट में बैंक स्टाफ इच्छा और बाध्यता के साथ उपकरण की तरह रहे। हां, इन्होंने भी घोटालेबाज़ों से अपने हिस्से के जरिये खुद को अमीर बनाया। इसमें कोई हैरानी नहीं कि बैंक कर्मचारी यूनियन इन बैंकों के अराष्ट्रीयकरण का विरोध करें! आज की तारीख में भारत में बैंक कर्मचारी सबसे ज्यादा पैसे पाने वाले कर्मचारियों में शामिल हैं, उनसे भी ज्यादा जो हमारी रक्षा करते हैं। अब वक्त आ गया है कि हम, करदाता भारत के खजाने के इस तरह के प्रबंधन के सही ऑडिट की मांग करें। 

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क्या सरकार भारत की जनता को बताएगी कि आखिर एक संसद सदस्य को टेलीफोन अलाउंस के रूप में 15000 रुपये महीने की रकम क्यों दी जाती है, जबकि मोबाइल कंपनियां 399 रुपये प्रति माह में अनलिमिटेड कॉल्स और डेटा के साथ ऑफर दे रही हैं। जब टैक्सपेयर्स से ये कहा जाता है कि वो हर सब्सिडी को सरेंडर करें तो ये नियम संसद में जनता का प्रतिनिधित्व करने वालों पर क्यों नहीं लागू किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से ये सब इस तरह काम करता नहीं दिख रहा।

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इसके अलावा सिर्फ पांच साल के एक कार्यकाल पर संसद के सदस्य कैसे पेंशन के हकदार हो जाते हैं, जबकि दूसरों को पेंशन के लिए दशकों तक काम करना होता है? उन्हें क्यों पेंशन मिलना चाहिए? इनके खाते में पेंशन के रूप में हर साल जाने वाली कुल रकम कितनी है? इसे तत्काल रोकना होगा।

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भारत में कितनी कंपनियां और तथाकथित ट्रस्ट को इनकम टैक्स और जीएसटी से छूट मिली हुई है? इस पर एक श्वेत पत्र जारी करने की अनिवार्य आवश्यकता है, केवल ये राशि एक बहुत बड़ी राशि के रूप में सामने आएगी। ये टैक्स से बचने का बिल्कुल साफ तरीका है, जिसमें सरकार की ऐच्छिक भागीदारी है। इन कंपनियों में से कुछ अपने अधिकारियों को ऊंची तनख्वाह यहां तक कि दो करोड़ रुपये सालाना तक देती हैं, इनके पास काफी पैसा जमा होता है, इसके बावजूद इनके फैलने में टैक्सपेयर्स का खून-पसीना बहाया जाता है, ट्रस्ट्स स्थानीय और विदेश दौरों पर खर्च करते हैं। इन सभी की स्वतंत्र ऑडिट की जरूरत है।

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टैक्सपेयर्स के पैसों के दुरुपयोग की लिस्ट अंतहीन है। सभी तरह के लोगों के सुरक्षा घेरे को देखें। क्यों? देश की राजधानी दिल्ली जैसे शहरों में सुरक्षा औऱ ट्रैफिक प्रबंधन की कमी है क्योंकि पर्याप्त पुलिसकर्मी नहीं हैं। दूसरी ओर, राजनीतिज्ञों और निजी लोगों को सुरक्षा कवच देने में कितने लोगों को लगाया जाता है। क्यों नहीं राजनीतिज्ञों को मिलने वाले सुरक्षा घेरे का खर्च उनकी राजनीतिक पार्टियों को वहन करना चाहिए? हां, ये राजनीतिक पार्टियों की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वो अपने लोगों का ख्याल रखे।

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ये बिल्कुल सही समय है कि सरकार टैक्सपेयर्स के पैसों के दुरुपयोग के मुद्दे पर साफ औऱ पारदर्शी तरीके से सामने आए। ये एक अनिवार्य आवश्यकता है कि श्वेतपत्र लाया जाए, जिसमें जो मुद्दे इस आलेख में ऊपर उठाए गए हैं, उनपर और इस दस्तावेज के निर्माण के दौरान जो मुद्दे सामने आएं, उनपर भी काम हो। इस दस्तावेज को सार्वजनिक किया जाए। यही वक्त है कि हम एक राष्ट्र की तरह इन सभी के जवाब जानें। ये देश काफी कुछ भुगत चुका है और टैक्सपेयर्स के पैसों के साथ यही होता रहा तो इससे ज्यादा भुगतना पड़ सकता है। भारत और भारत की अर्थव्यवस्था को बचाएं।

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प्रेम प्रकाश, चेयरमैन, एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल (ANI) 

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*आलेख में व्यक्त की गई राय लेखक की व्यक्तिगत सोच है


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