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सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला, निष्क्रिय इच्छामृत्यु की दी इजाजत

Last Modified - March 10, 2018, 9:42 am

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम फैसल सुनाते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेसिया) की स्वीकृति दे दी. पैसिव यूथेनेसिया और इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) क़ानूनी रूप से मान्य होगी. यानी कोई भी व्यक्ति लिविंग विल छोड़कर जा सकता है कि अगर वो अचेत अवस्था में चला जाए और स्थिति ऐसी हो कि अब सिर्फ कृत्रिम लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की मदद से ही उसे ज़िंदा रखा जा सकता है, उस हालात में उसकी वसीयत का सम्मान किया जाए.

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कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को ये फ़ैसला लेने का पूरा अधिकार है कि अगर उसके ठीक होने की उम्मीद नहीं है तो उसे लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की मदद से ज़िंदा ना रखा जाए. उस व्यक्ति के फ़ैसले का डॉक्टर और उनके परिवार को सम्मान करना होगा.

अगर कोई व्यक्ति अचेत है और विल नहीं लिखी है और उसे सिर्फ़ लाइफ सपोर्ट सिस्टम से ही ज़िंदा रखा जा सकता है. तो उसका इलाज करने वाले डॉक्टर और उसके परिजन मिलकर फ़ैसला ले सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड बनाने की भी बात कही है, जो किसी की इच्छा मृत्यु की याचिका पर विचार करेगा. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष के के अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया है.

पैसिव यूथेनेसिया क्या होता है?

इच्छा मृत्यु के मामले दो तरह के होते हैं- एक निष्क्रिय इच्छा मृत्यु और दूसरी सक्रिय इच्छा मृत्यु. अगर कोई मरीज वेंटिलेटर पर है यानी उसका शरीर खुद को ज़िंदा रखने में सक्षम नहीं है, बल्कि मशीनों की मदद से उसका दिल काम कर रहा है. तो पैसिव यूथेंशिया यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में धीरे-धीरे उस लाइफ़ सपोर्ट को कम किया जाता है, वेंटिलेटर बंद किए जाते हैं. इससे व्यक्ति की प्राकृतिक मृत्यु हो जाती है.

 

 

वेब डेस्क, IBC24


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