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22 मार्च यानी विश्व जल दिवस : पूरा विश्व पानी के संकट से जूझ रहा है

Last Modified - March 22, 2018, 6:06 pm

इस वर्ष  विश्व जल दिवस उत्सव के लिए थीम है- "जल के लिए प्रकृति के आधार पर समाधान" l पानी केवल हमारी ही समस्या नहीं है, यह पूरे विश्व की समस्या है l सबसे पहले रियो डि जेनेरियो में 1992 में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCED) में विश्व जल दिवस मनाने की पहल की गई थी। तबसे 22 मार्च यानी विश्व जल दिवस, 25 साल हो गया इस दिन को मनाते हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को विश्व जल दिवस के मौके पर 'जल शक्ति' के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि लोगों द्वारा पानी के संरक्षण से शहरों, गांवों और किसानों को अपार लाभ मिलता है. 

 इस दिन को मनाने का मकसद यह था, कि लोग इस दिवस से कुछ सीख लेकर अपने अस्तित्व के लिए पानी का अस्तित्व बरकरार रखेंगे। ऐसा नहीं है कि पानी का महत्व कोई जानता नहीं है, सभी इससे परिचित है, लेकिन कोई  पहल नहीं करना चाहता, फलाना पानी की बचत नहीं कर रहा तो हम क्यों करें, हमारी यही सोच आने बाली पीड़ी को मुसीबत में डाल रही है, इस सोच से मुक्ति पानी होगी। और सबको एक साथ इसके लिए आगे आना होगा।

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 इस समस्या का ऐसा समाधान खोजना जो प्रकृति पर ही आधारित हो। तो आइए इस समस्या का ऐसा समाधान खोजे जो प्रकृति को और आने वाली पीढ़ी को नया आयाम दे l पानी के बिना इंसान की मौत भी हो सकती है, इसको लेकर अलग अलग धारणाएं सामने आती है. कुछ तथ्यों का कहना है कि, गर्म मौसम में बंद कार के भीतर बैठा बच्चा और गर्मी में खेल रहा एक एथलीट पानी नहीं मिलने पर कुछ ही घंटों में मर सकते हैं. तो कुछ का मानना है कि, एक मनुष्य क़रीब बीस दिन तक खाने के बिना तो रह सकता है. लेकिन पानी के बिना तीन-चार दिन से ज़्यादा जीना बहुत मुश्किल है l पर ऐसा क्यों होता है? इसका एक ही जवाब है डी-हाईड्रेशन. यानी शरीर में पानी की कमी होना. ज्ञानिकों के मुताबिक डी-हाईड्रेशन वो अवस्था है जब आपका शरीर पानी की जितनी मात्रा छोड़ रहा होता है, पानी की उतनी मात्रा उसे मिल नहीं रही होती. छोटे बच्चों और बुज़ुर्गों को डी-हाईड्रेशन से सबसे ज़्यादा ख़तरा होता है. और सही वक़्त पर इस पर ध्यान नहीं दिया जाए, तो ये जानलेवा हो सकती है.

 

ऐसा कहा जाता है कि दिन में जितनी बार खाना खाएं, उतनी बार कम से कम पानी ज़रूर पियें. कम पानी पीने से किडनी से जुड़ी समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाती है. पाचन ख़राब होता है और ख़ूँन की क्वालिटी बिगड़ती हैतो आइए इस समस्या का ऐसा समाधान खोजे जो प्रकृति पर आधारित हो और जो प्रकृति को और आने वाली पीढ़ी को नया आयाम दे l

web team IBC24


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