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सत्ता साध्य और साहू साधन 

Last Modified - March 28, 2018, 11:17 am

छत्तीसगढ़ में अभी नहीं तो कभी नहीं के मोड में आ चुकी कांग्रेस ने सत्ता हासिल करने के लिए साहू समाज को साधना शुरू कर दिया है. पिछले दिनों हुए राज्यसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार सरोज पांडेय के खिलाफ कांग्रेस ने लेखराम साहू को उम्मीदवार बनाकर मतदान के हालात पैदा किये और अपनी पराजय को अगली रणनीतिक जीत के तौर पर प्रचारित किया। इस हार को अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि कांग्रेस आलाकमान ने छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के एकमात्र सांसद ताम्रध्वज साहू को संगठन में पिछड़ा वर्ग विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया.मतलब साफ़ है कि कांग्रेस प्रदेश के मैदानी इलाकों में अपनी पिछली हार को इस बार जीत में बदलने के लिए पिछड़ा कार्ड खेलने का मन बना चुकी है और पिछड़ा वर्ग में भी उसने प्रदेश के साहू समाज को साधने की तैयारी शुरू कर दी है.

ऐसा लग रहा है कि प्रदेश की नब्बे विधानसभा सीटों में से 51 सामान्य सीटों पर कांग्रेस फोकस करने जा रही है क्योकि कि इन 51 सीटों पर पिछले चुनावों में उसके दिग्गज धराशायी हुए थे. इन्ही मैदानी इलाकों की हार ने उसे सत्ता से दूर किया था और कांग्रेस राज्य के पहाड़ी इलाकों तक सिमट कर रह गई थी.कांग्रेस को भरोसा है कि प्रदेश के बस्तर और सरगुजा के आदिवासी क्षेत्र पिछली बार की तरह 2018 के चुनावों में भी उसके साथ बने रहेंगे इसलिए वह 51 सीटों वाले मैदानी इलाकों को जातीय समीकरण के जरिये साधने में जुट गई है. इस कवायद में प्रदेश का साहू समाज इस समय कांग्रेस का साध्य बनता जा रहा है. आखिर साहू समाज पर कांग्रेस के डोरे डालने की वजह भी लाजिमी है.पिछले विधानसभा के चुनावों में साहू समाज के 9 लोग जीत कर विधानसभा पहुंचे,इनमें 5 भाजपा और 4 कांग्रेस की टिकिट पर चुनाव जीते. लोकसभा का सीन भी कुछ ऐसा ही है. प्रदेश की कुल 11 लोकसभा सीटों से 6 लोकसभा सीट सामान्य वर्ग के खाते में हैं इनमे भी तीन सीटों पर साहू समाज का कब्ज़ा है. महासमुंद से चंदूलाल साहू और बिलासपुर से लखनलाल साहू भाजपा के सांसद हैं और दुर्ग से ताम्रध्वज साहू ने भाजपा की उम्मीदवार सरोज पांडेय को पराजित कर कांग्रेस को एकमात्र विजय दिलाई.प्रदेश की पचास फीसदी पिछड़ा वर्ग की आबादी इस चुनाव में केंद्र में होगी और उसमें भी साहू समाज पर दोनों दलों का फोकस होगा.

राज्य की मौजूदा कांग्रेस में बीच बीच में नेतृत्व को लेकर असहमति और असंतोष के स्वर उठते रहते हैं.कांग्रेस के पास महेंद्र कर्मा के निधन के बाद कोई बड़ा आदिवासी चेहरा रहा नहीं। कांग्रेस के तात्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल की मौत के बाद भूपेश बघेल पिछड़ा वर्ग का स्वीकार्य चेहरा बनने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पार्टी के भीतर उनका विरोध भी छुपा नहीं है. खासकर प्रदेश के एक मंत्री के सीडी काण्ड के बाद बघेल के ताप में भी कमी भी आयी है. कांग्रेस में यह चर्चा भी आम रहती है कि चुनाव तक भूपेश बघेल अध्यक्ष रहेंगे भी या नहीं। दरअसल, कांग्रेस भूपेश बघेल, चरण दास महंत और टीएस सिंहदेव की "परसनाल्टी वार" का शिकार होती जा रही है.विगत छह महीने में भाजपा सरकार को घेरने के मामले में जो विफलता लगातार भूपेश और सिंहदेव के खाते में गई है,उससे नहीं लगता कि इनमें से किसी पर भी कांग्रेस का आलाकमान कोई दांव लगाने के मूड में हो. पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत का टेस्ट पार्टी पहले ही ले चुकी है. ऐसे हालातों में कांग्रेस के एकमात्र सांसद या यूँ कहिये कि साहू सांसद ताम्रध्वज साहू को चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी देना,आगे चलकर प्रदेश कांग्रेस में नए समीकरणों को जन्म दे सकता है.जिन लोगों ने जोगी के शासनकाल में विधानसभा की कार्रवाई देखी होगी वे इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि उस सरकार में बतौर शिक्षा राज्य मंत्री के सदन में ताम्रध्वज साहू का प्रदर्शन प्रभावशाली होता था.जोगी शासनकाल में वे एक अच्छे मंत्री भी साबित हुए और फिर कांग्रेस के लोगों को पिछले दिनों हुए महाधिवेशन में राहुल गाँधी का भाषण भी याद होगा जिसमें उन्होंने जल्द ही कुछ ठोस और नया करने का भरोसा कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं को दिलाया था.आज राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ के इकलौते लोकसभा सदस्य ताम्रध्वज साहू को पिछड़ा वर्ग विभाग का और महाराष्ट्र से नितिन राउत को अनुसूचित जाति विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर जो सन्देश दिया है,प्रदेश के कांग्रेस नेताओं को उसे बूझने में जुट जाना चाहिए क्योकि दौड़ में जरुरी नहीं कि आगे रहने वाले ही मैडल ले आएं.....एक दिलचस्प बात ये कि राज्यसभा के लिए भाजपा उम्मीदवार को निर्विरोध चुने जाने से रोकने के लिए भूपेश बघेल ने पूर्व विधायक लेखराम साहू को आगे कर एक सुरक्षित दांव खेला लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने छत्तीसगढ़ से ताम्रध्वज साहू को राष्ट्रीय स्तर पर आगे कर भूपेश की पेशानियों पर बल बढ़ा दिए हैं.

 

 

प्रफुल्ल पारे, एसोसिएट एडिटर, IBC24

 


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