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"सर्वे का संदेश"

Created at - April 4, 2018, 2:04 pm
Modified at - April 4, 2018, 2:04 pm

29 नवंबर 2005 को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अपने कार्यकाल के तेरहवें साल में इस साल चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं। लोकमान्यता में तेरह का अंक अनिष्टकारी और मनहूस माना जाता है। इस लोकमान्यता को दकियानूसी करार दें तो भी शिवराज के लिए मौजूदा हालात बेहद अशुभ संकेत दे रहे हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सबसे भरोसेमंद चैनल IBC24 के ओपिनियन पोल के नतीजों में तो कम से कम यही संकेत छिपा है। 

IBC24 ने अपने 'जनकारवां' कार्यक्रम के तहत 51 जिलों में जनचौपाल लगाई। इस दौरान 15 हजार से भी ज्यादा लोगों से 11 सवालों पर उनकी राय जानी गई, तो जो नतीजे आए वो वाकई काफी हैरान करने वाले हैं। ओपिनियन पोल को जनता का मूड मीटर मानें तो कांग्रेस इस संभावना पर मुस्कुरा सकती है कि उसका पंद्रह सालों का सूखा खत्म होने जा रहा है। सर्वे के मुताबिक अगर अभी चुनाव हुए तो बीजेपी 101 सीटों पर सिमट रही है जबकि कांग्रेस 119 सीटों के साथ सरकार बनाने की स्थिति में है। बाकी 10 सीटें अन्य के खाते में गई हैं। हैरानी की बात ये है कि भाजपा बुंदेलखंड इलाके में मामूली बढ़त को छोड़कर बाकी सभी संभाग में पिछड़ रही है।सर्वे का दूसरा चौंकाने वाला नतीजा मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की लोकप्रियता को लेकर सामने आया। मुख्यमंत्री पद के संभावित 6 चेहरों को लेकर जनता से पूछी गई राय में भी शिवराज सिंह चौहान पिछड़ गए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया को सबसे ज्यादा 37 फीसदी लोगों ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी पसंद बताया जबकि शिवराज सिंह के नाम पर 31 फीसदी लोगों ने अपनी सहमति जताई। भाजपा के लिए दिल तोड़ने वाली बात तो ये रही कि शिवराज सरकार के कामकाज पर 58 फीसदी लोगों ने असंतोष जताया है जबकि 36 फीसदी जनता ने अच्छा माना। इसके अलावा किसान और कानून व्यवस्था जैसे जनमत तय करने वाले निर्णायक मुद्दे पर भी भाजपा के लिए काफी निराशाजनक नतीजे सामने आए हैं। भाजपा भले सुविधाजनक तरीके से ओपनियन पोल को हकीकत से परे बताकर आइना देखने से परहेज करे लेकिन संदेश तो यही छिपा है कि शिवराज सिंह चौहान का जादू अब अपनी चमक खो रहा है। एक ब्रॉन्ड के तौर पर शिवराज को कई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें सबसे अहम चुनौती अपनी छवि को घपले-घोटालों से बेदाग बनाए रखने की है। सरकार पर लगे घोटालों की लंबी फेहरिश्त है। कांग्रेस तो मध्यपदेश सरकार के 13 साल यानी 156 महीने पूरे होने पर 156 घोटालों की सूची जारी कर चुकी है। इन आरोपों की प्रमाणिकता भले साबित होना बाकी हो, लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि सियासत में प्रमाणिकता से ज्यादा परशेप्शन की अहमियत होती है और कांग्रेस बदनामी मढ़ने में फिलहाल कामयाब रही है।

शिवराज के सामने दूसरी बड़ी चुनौती 3 K को साधने की है। 3K यानी किसान, कर्मचारी और कानून व्यवस्था। बात पहले K यानी किसानों की। विपक्षप्रेरित किसान आंदोलन शिवराज के दूसरे कार्यकाल में सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो रहे हैं। ऊपर से मंदसौर में पुलिस फायरिंग में हुई किसानों की मौत मध्यप्रदेश सरकार के दामन पर ऐसा बदनुमा दाग छोड़ गई है, जिसे छुड़ा पाने में शिवराज को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। किसानों का दिल जीतने के लिए शिवराज सरकार ने इतना कुछ किया है जो शायद ही देश की किसी प्रदेश सरकार ने किया हो। हालिया भावान्तर योजना के अलावा कृषि ऋण माफ, समर्थन मूल्य, सूखा राहत राशि जैसी तमाम किसान कल्याणकारी योजनाओं/घोषणाओं की लंबी लिस्ट है, लेकिन इसे शिवराज का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि किसानों की भलाई के लिए गिनाने को इतना कुछ होने के बावजूद उनके हिस्से में अपयश ही आया है। इस दुर्भाग्यजनक स्थिति के लिए नीयत नहीं बल्कि नीति के क्रियान्वयन में बरती गई कोताही जिम्मेदार है। तभी तो IBC24 के सर्वे में 57 फीसदी लोगों ने माना कि किसानों के लिए उठाए गए कदम फायदेमंद साबित नहीं हुए हैं। यही वजह है कि किसानो के लिए योजना के स्तर पर इतना दिल खोलकर लुटाने के बावजूद किसान मुंह फुलाए बैठा है।इधर किसान मुंह फुलाए हुए हैं तो दूसरा K यानी कर्मचारी खार खाए बैठा है। वेतनमान, नियमितिकरण जैसी परंपरागगत मांगों के अलावा दीगर मांगों को लेकर कर्मचारी संगठन सरकार की नाम में दम किए हुए हैं। ऊपर से कर्मचारियों को उल्टा टांग देने जैसी भभकी देकर शिवराज कर्मचारियों के बीच अपनी ब्रॉन्ड वैल्यू को पहले ही नुकसान पहुंचा चुके हैं। वहीं प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर शिवराज के स्टैंड ने सामान्य वर्ग के कर्मचारियों में उन्हें खलनायक सा बना दिया है। 'कोई माई का बाप आरक्षण नहीं हटा सकता' जैसे बड़े बोल को सामान्य वर्ग के कर्मचारी भूले नही हैं और सबक सिखाने के मूड में बैठे हैं। बड़ी मुश्किल है- एक को मनाऊं तो दूजा रूठ जाता है।तीसरा K यानी कानून व्यवस्था का तो और भी बुरा हाल है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े खुद ही मध्यप्रदेश में अपराध के बोलबाले की गवाही देते हैं। NCRB की साल 2016 की रिपोर्ट में रेप के 4882 दर्ज मामलों के साथ मध्यप्रदेश देश में फिर से अव्वल रहा। दूसरे 15 संगीन अपराधों में भी मध्यप्रदेश टॉप टेन प्रदेशों में शुमार है। हालांकि हर सरकारें थानों में अपराध संख्या के बढ़ते आंकड़ों का बचाव कानून व्यवस्था में लोगों के बढ़ते भरोसे का हवाला देकर करती रहीं हैं। मासूम तर्क यही रहता है कि लोगों में न्याय पाने की उम्मीद बढ़ी है तभी तो लोग शिकायतें दर्ज कराने थाने पहुंच रहे हैं। लेकिन इस दावे पर प्रदेशवासी ऐतबार नहीं करते वरना IBC24 के सर्वे में 61 फीसदी लोग प्रदेश की कानून व्यवस्था को क्यों  खराब बताते।

IBC24 के सर्वे में सड़क, बिजली, रोजगार जैसे मुद्दों पर भी लोगों ने बेहद कम अंक दिए हैं। इन्हीं सब फुटकर नाराजगी का असर शिवराज सरकार के ओवरऑल परफॉरमेंस पर पड़ा है। सर्वे बताता है कि प्रदेश की 58 फीसदी जनता ने शिवराज सरकार के कामकाज पर असंतोष जताया है। यही वो आंकड़ा है जो शिवराज सरकार को आत्मविवेचना करने की जरूरत जता रहा है। अब शिवराज सरकार के सामने दो विकल्प हैं- या तो वो IBC 24 के सर्वे को फर्जी, मनगढ़ंत, पूर्वाग्रही, अप्रमाणित जैसे उलाहनों की आड़ लेकर खारिज कर दे या फिर वो इसे आत्मावलोकन का मौका मानकर इसका इस्तेमाल परफॉरमेंस में सुधार लाने में करे। मर्जी आपकी।

सौरभ तिवारी

- असिस्टेंट एडिटर, IBC24

 


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