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जनता मांगे हिसाब: बैहर और सारंगपुर की जनता मांगा हिसाब

Last Modified - April 21, 2018, 5:31 pm

बैहर की भौगोलिक स्थित

और अब बात करते हैं मध्यप्रदेश की बैहर विधानसभा सीट की..सबसे पहले इस सीट की भौगोलिक स्थिति पर नजर डाल लेते हैं। 

बालाघाट जिले में आती है बैहर विधानसभा

ST वर्ग के लिए आरक्षित है सीट

क्षेत्र में लगभग 60 प्रतिशत आदिवासी बैगा जनजाति के लोग

खनिज और वनसंपदा से भरपूर क्षेत्र

राजस्व देने के मामले में अग्रणी 

जनसंख्या- करीब 3 लाख

कुल मतदाता- 1 लाख 99 हजार 789

लिंगानुपात के मामले में महिलाओं की स्थिति बेहतर

वानांचल में निवास करती है क्षेत्र की 70 फीसदी आबादी 

पिछले कुछ वर्षों से नक्सलवाद सक्रिय

मलाजखंड में एशिया की सबसे बड़ी खुली कॉपर खदान

वर्तमान में विधानसभा सीट पर काग्रेस का है कब्जा

कांग्रेस के संजय उइके हैं वर्तमान विधायक 

बैहर विधानसभा क्षेत्र की सियासत 

बैहर विधासनभा की सियासी इतिहास की बात करें तो ..सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस का एकाधिकार रहा है..2003 और 2008 को छोड़ दिया जाए तो भारतीय जनता पार्टी यहां कांग्रेस को हरा पाने में नाकाम रही है..जाहिर है आने वाले चुनाव में भी यहां कांग्रेस-और बीजेपी के बीच ही सियासी घमासान होगा..कांग्रेस के सामने जहां चुनौती होगी कि वो अपने गढ़ में बीजेपी को सेंध लगाने से रोके...वहीं बीजेपी भरसक कोशिश करेगी कि वो जीत का रिकार्ड सुधारे। 

बैहर विधानसभा में करीब 60 फीसदी आदिवासी बैगा जनजाति के लोग निवास करते हैं...यही वजह है कि यहां कि सियासत भी इन्हीं आदिवासियो को केंद्र में रखकर होती आई है..एसटी वर्ग के लिए आरक्षित इस सीट पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही मुख्य मुकाबला रहा है..वर्तमान में आदिवासी समाज से आने वाले कांग्रेस नेता संजय उइके विधायक हैं। वैसे तो बैहर विधानसभा सीट कांग्रेस का गढ़ रहा है..और सबसे अधिक यहां से कांग्रेस के विधायक ही चुने जाते रहे हैं..लेकिन 2003 और 2008 के चुनाव में बीजेपी के भगत नेताम यहां से चुनाव जीते..हालांकि इस सीट पर कांग्रेस-बीजेपी के अलावा गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी हर चुनाव में अपनी छाप छोड़ती आई है। बैहर में वही पार्टी सफल होती है..जो आदिवासी वाटर्स को साधने में सफलता हासिल करता है..अब जब चुनावी साल है तो..टिकट की दावेदारी पक्की करने के लिए कई नेता अब जनता के भीड़ में नजर आने लगे हैं। 

कांग्रेस की बात करें तो वर्तमान विधायक संजय उईके का पार्टी से लड़ना तय माना जा रहा है...लेकिन भारतीय जनता पार्टी की बात की जाए तो पूर्व विधायक भगत नेताम को पार्टी फिर टिकट दे सकती है। वहीं उनकी पत्नी और जिला पंचायत उपाध्यक्ष अनुपमा नेताम का नाम भी सामने आ रहा है..इनके अलावा भी बीजेपी के कई नेता टिकट पाने के लिए सक्रिय हो गए हैं.. तीसरे मोर्चे के रूप में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ कई निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनावी मैदान में ताल ठोकने को तैयार हैं...जो आने वाले चुनाव में कांग्रेस-बीजेपी का चुनावी गणित बिगड़ सकते हैं। 

बैहर विधानसभा के प्रमुख मुद्दे

बैहर विधानसभा मध्यप्रदेश के मंडला जिले और छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की सीमा से लगा हुआ है। छत्तीसगढ़ में फोर्स के बढ़ते दबाव के बाद नक्सलवाद यहां फिर पनपने लगा है..जिसके कारण यकीनन बैहर में विकास कार्य प्रभावित होने लगा  है। इसके अलावा यहां रोजगार, सिंचाई , स्वास्थ, शिक्षा, सड़क और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर भी नेता हर चुनाव में वादे करते हैं...लेकिन धरातल में उन पर काम नजर नहीं आता..ऐसे में अब जब चुनावी साल है..पुराने मुद्दों का एक बार गूंजना तय  है। 

बैहर.. वैसे तो खनिज और वन संपदाओं के लिहाज से काफी धनी इलाका है...और राजस्व देने के क्षेत्र में भी अग्रणी रहा है..लेकिन यहां रहने वाले आदिवासियों को इसका कोई लाभ नहीं मिला..वो आज भी रोजी-रोटी के लिए दूसरे इलाकों में पलायन को मजबूर हैं..आलम ये है कि साल दर साल पलायन होने वाले स्थानीय लोगों की तादात बढ़ते जा रही है। यहां करीब 60 फीसदी आदिवासी बैगा जनजाति के लोग निवास करते है।और उनकी बड़ी आबादी पीने के पानी के लिए नदी, नाले और झिरिया के गंदे पानी पीने को मजबूर हैं।

वहीं स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो एंबुलेंस की सुविधा नहीं होने से लोग मरीजों को पीठ या खाट पर लाद कर अस्पताल पहुंचाते हैं...प्रसव के लिए इलाके में जननी सुरक्षा योजना एम्बुलेंस तक नहीं है.. इसके अलावा सड़क नहीं होने से बरसात के दिनों में कई इलाके टापू बन जाते हैं.. और आदिवासी अपने गांव से बाहर निकल नहीं पाते..वहीं बच्चों का भी स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है। बारिश के मौसम में तो कई महिनों तक स्कूल ही नहीं खुलते.. यहां रहने वाले आदिवासियों को दो वक्त की रोजी रोटी के लिए भी काफी मशक्त करनी पड़ती है..राजस्व देने के मामले में सबसे अग्रणी क्षेत्र होने के बावजूद यहां के लोग कामकाज की तलाश में पलायन के लिए मजबूर हैं । 

वहीं छत्तीसगढ़ में फोर्स के बढ़ते दबाव के बाद एक बार फिर नक्सली यहां सक्रिय हो गये है। जिसके कारण क्षेत्र के कई इलाके में शासन के विकास कार्य प्रभावित हो गये है।

इसमें कोई शक नहीं की बैहर में नक्सलवाद बड़ी समस्या बनती जा रही है लेकिन सियासत में ये बहाने के तौर पर भी खूब इस्तेमाल होता है ...आने वाले चुनाव में रोजगार का मुद्दा इस इलाके में जमकर गूंजने वाला है ..

सारंगपुर की भौगोलिक स्थिति

अब बात करते हैं मध्यप्रदेश की सारंगपुर विधानसभा सीट की..

राजगढ़ जिले में आती है सारंगपुर विधानसभा

पचोर और सारंगपुर दो तहसील में बंटा है क्षेत्र

क्षेत्रफल-  967 वर्ग किमी से ज्यादा

जनसंख्या- करीब 3 लाख 58 हजार

कुल मतदाता-  1 लाख 82 हजार 

वर्तमान में सीट पर बीजेपी का कब्जा

बीजेपी के कुंवर कोठार हैं वर्तमान विधायक

सारंगपुर की सियासत

सारंगपुर के सियासी इतिहास की बात करें तो ..मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में आने वाली इस सीट पर हमेशा दिलचस्प सियासी जंग के हालत बनते आए हैं...अब जब विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है ऐसे में सियासी दल भी एक्टिव मूड में नजर आने लगे हैं..इसके साथ ही विधायक की टिकट की आस लगाए नेता भी अब सक्रिय हो चले हैं...बीजेपी में दावेदारों की लंबी लाइन लगी है तो वहीं कांग्रेस में भी टिकट के लिए दावेदार अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं ।

मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के मजबूत गढ़ों में से एक है सारंगपुर विधानसभा...राजगढ़ जिले में आने वाली इस सीट पर शुरू से पार्टी का दबदबा रहा है...बीजेपी का इस सीट कितना असर है..इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1957 से लेकर अब तक कांग्रेस सिर्फ 3 बार ही जीत दर्ज कर सकी है। 2013 की बात करें तो सीट पर बीजेपी के कुंवर कोठार ने कांग्रेस के कृष्ण मोहन मालवीय को शिकस्त देकर सीट पर कब्जा किया.. 

आने वाले चुनाव में दावेदारों की बात करे तो भारतीय जनता पार्टी का गढ़ होने की वजह से यहां दावेदारों की लम्बी कतार नजर आती है.. फिर भी वर्तमान विधायक कुंवर कोठार की दावेदार सबसे प्रबल है..इनके अलावा  पूर्व विधायक गौतम टैटवाल और दिलीप वंशकार ने भी टिकट के लिए दावेदारी पेश की है.. जबकि कांगेस की बात करे तो मालवीय समाज संख्या बाहुल्य होने की वजह से कांग्रेस शरू से ही मालवीय समाज के प्रत्याशी को ही मैदान में खड़ा करती रही है.. इसलिए कांग्रेस से कृष्ण मोहन मालवीय को पार्टी फिर मोका दे सकती है..हालांकि  घनश्याम मालवीय और बनवारी मालवीय भी सारंगपुर सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर रहे है ! 

सारंगपुर के प्रमुख मुद्दे

सारंगपुर विधानसभा सीट पर शुरू से ही भाजपा के कब्जे में रही है.. बावजूद इसके यंहा कोई खास विकास देखने को नही मिलता है ! बदहाल सड़के , बेतरतीब यातायात और बेरोजगारी इस विधानसभा की पहचान बन चुके है ! यहाँ रोजगार के लिए कोई छोटा या बड़ा उद्योग नही है ..वहीं  शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी पिछड़ा नजर आता है सारंगपुर

सारंगपुर...जहां परवान चढ़ा था रानी रूपमति और बाजबहादुर शाह का प्यार..और जिस प्यार के लिए रानी रूपमति ने की थी खुदकुशी..जिसकी याद में यहां एक मकबरा भी बना हुआ है...लेकिन आज उस अमिट प्रेम की निशानी पुरातत्व और पर्यटन विभाग की अनदेखी का शिकार है..सारंगपुर में रानी रूपमति का मकबरा ही केवल उपेक्षा का शिकार नहीं है...बल्कि यहां की जनता भी बरसों से ठगी जा रही है..जी हां बीजेपी का गढ़ होने के बावजूद इलाके में विकास नजर नहीं आता..जबकि बीते 15 सालों प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। आज भी यहां की जनता को बेहतर सड़कों का इंतजार है..रही सही कसर यहां की बदहाल ट्रैफिक पूरा कर देती है। वहीं अस्पताल में डॉक्टर नहीं होने से मरीजों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। महिला डॉक्टर नहीं होने से महिला मरीजों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है...नेवज और कालीसिंध दो नदियां सारंगपुर क्षेत्र से होकर गुजरती है बावजूद इसके यहां पेय जल की समस्या गंभीर रूप से बनी हुई है। ट्रेनों की स्टॉपेज बढ़ाने की मांग यहां के लोग लगातार करते आ रहे हैं लेकिन उस पर भी अब तक कुछ नहीं हो सका है...शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो क्षेत्र में कॉलेज तो हैं लेकिन प्रोफेशनल कोर्सेस के लिए छात्रों को भोपाल, इंदौर का रूख करते हैं....कुल मिलाकर सारंगपुर में दुश्वारियों की कोई कमी नहीं है..और इन समस्याओं के लिए बीजेपी कोई बहाना भी नहीं बना सकते...क्यों कि क्षेत्र की जनता ने उन्हें खूब मौके दिए हैं और इस बार वो इन मौकों का पूरा हिसाब मांगने के मूड में हैं।

 

वेब डेस्क, IBC24


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