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देखो ! उड़ने लगी चुनावी चिड़िया 

Reported By: Shahnawaz Sadique, Edited By: Shahnawaz Sadique

Published on 23 Apr 2018 07:27 PM, Updated On 23 Apr 2018 07:27 PM

बचपन में हम अक्सर चिड़िया उड़ाने वाला खेल खेला करते थे। बचपन के इस खेल की याद छत्तीसगढ़ के दो बड़े सियासतदारों ने ताजा कर दी है। बचपन के खेल में उड़ने वाली चीजों को आप उड़ा सकते हैं, लेकिन जो चीजें या जीव जन्तु नहीं उड़ते हैं, उन्हें उड़ाने वाला हार जाता है। राजनीति के इस खेल में कौन सी चीज उड़ाई जाती है और कौन सी नहीं, इसके नियम कायदों के बारे में कुछ कहना मुश्किल है, क्योंकि ये तो सियासतदारों की बात है। लेकिन इतना तो तय है कि उड़ने के लिए हवा का रूख महत्वपूर्ण होता है। सियासी मैदान में उड़ने-उड़ाने के लिए वोटर्स (जनता) का रूख अहम होता है। छत्तीसगढ़ में भी सत्ता के लिए विकास की चिड़िया उड़ाई जा रही है। अब इसमें हवा यानी जनता का रूख ही तय करेगा कि किस चिड़िया को जनता का समर्थन मिलेगा और उसे पांच साल की उड़ान के लिए खुला आकाश मिलेगा। 

खैर, चिड़िया उड़ाना महज एक खेल नहीं है। इसके जरिए छोटे बच्चों को उड़ने वाली चीजों, जीव-जन्तुओं और नहीं उड़ने वाली वस्तुओं, जीव-जन्तुओं के बीच अंतर को खेल के जरिए समझाया जा सकता है। अगर, छत्तीसगढ़ के राजनीतिक धुंरधरों के बीच चल रहे खेल के पीछे केवल सत्ता पाना मकसद है, तो उन्हें समझना होगा कि ये पब्लिक है, जो सब जानती है। क्योंकि छत्तीसगढ़ में 18 बरस बाद भी स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी और बिजली जैसी मूलभूत समस्याएं बनीं हुई है। सूबे के आदिवासी इलाकों में लोग मलेरिया और बुखार जैसी छोटी बीमारियों में डॉक्टर-अस्पताल की कमी के कारण अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं। आने वाली पीढ़ी स्कूल और शिक्षक की कमी के कारण पिछड़ रहे हैं। शहरी इलाकों में नशे और अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में केवल राजनीति के लिए चिड़िया उड़ाना उचित नजर नहीं आता। हमारे सामने एक बड़ा उदाहरण है। कभी भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। जब इस देश की धरती धन-संपदाओं से भरपूर और खेत-खलियान से आच्छादित थे, लेकिन विलायती शासक अपने साथ इस सोने की चिड़िया को भी  ले उड़े। हमें इससे सबक लेने की जरूरत है। ऐसा न हो कि दो की लड़ाई में तीसरा चिड़िया उड़ा ले जाए, जिससे देश और समाज को भी कीमत चुकानी पड़े। 

ऐसा भी नहीं है कि हमारी सोने की चिड़िया उड़ गई है, तो हम गरीब हो गए हैं। आज भी हम किसी मामले में कम नहीं। बस जरूरत है तो इच्छाशक्ति की, क्योंकि चिड़िया का काम तो उड़ने का है, बस उसे इच्छाशक्ति रूपी खुला आकाश मिलना चाहिए। फिर देखिए वो कैसे जी भरकर उड़ान भरती है। बड़ा सवाल यह भी है कि हम जिस विकास की चिड़िया को उड़ा रहे हैं उसे तो खुला आकाश मिलना चाहिए। दूसरा सवाल यह भी है कि हमें हवा के रूख यानी जनता की तकलीफों-समस्याओं को समझाना होगा, वरना बपचन के खेल की तरह इसमें भी कुछ देर का मनोरंजन तो हो सकता है, लेकिन हम वाकई गरीबों-आदिवासियों और राज्य का विकास कर पाएंगे, इसकी संभावना नहीं दिखाई देती और जनता तो यही कहेगी कि देखो-चुनावी चिड़िया उड़ने लगी है।

 

समरेन्द्र शर्मा, कंटेंट हेड, IBC24

 

 

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