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तीन दिन...तीन तस्वीरें.. सियासत के बदलते रंग

Created at - May 5, 2018, 7:11 pm
Modified at - May 5, 2018, 7:11 pm

मध्यप्रदेश की सियासत में पिछले दिनों तीन दिन में तीन तस्वीरें देखने को मिलीं। सामान्य तौर पर तीनों को देखा जाए तो कुछ एकदम सामान्य दिखाई पड़ता है, लेकिन तीनों का गंभीरता से विश्लेषण किया जाए और राजनीतिक मायने निकाले जाएं तो बड़ी खबर निकलती है। 

पहला दिन-पहली तस्वीर : 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह दिल्ली यात्रा पर गए। वहां उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित पार्टी के तमाम दिग्गज नेताओं से हुई। क्या बात हुई किसी को नहीं पता लेकिन सीएम ने ट्वीट करके प्रधानमंत्री का सहयोग के लिए आभार जताया।  

दूसरा दिन-दूसरी तस्वीर : 

मुख्यमंत्री ने भोपाल में एक कार्यक्रम में कहा कि कुर्सी किसी के लिए परमानेंट नहीं होती। सीएम की कुर्सी खाली है, मैं तो जा रहा हूं.. इस पर कोई भी बैठ सकता है। बाद में सरकार और संगठन दोनों ने मिलकर यह साबित करने का भरसक प्रयास किया कि मुख्यमंत्री ने तो सब आनंद भाव में कहा था। 

तीसरा दिन-तीसरी तस्वीर: 

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भोपाल आए। मुख्यमंत्री ने स्वागत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अमित शाह ने अपने भाषण में कहा कि इस चुनाव को भाजपा संगठन के आधार पर जीतने का संकल्प लें संगठन के आधार पर चुनाव जीतने का रास्ता अख्तियार करें। 

लगातार तीन दिन की ये तीन तस्वीरें बहुत कुछ बयां करती थीं। पहले दिन कुछ तो हुआ था, जिससे सीएम साहब कहीं न कहीं आहत थे। दूसने दिन उनकी पीड़ा जुबां पर आ गई और कहा दिया कि कुर्सी परमानेंट नहीं होती..।  भले ही उनके सिपहसलारों ने इसे आनंद में कही गई बात करार दे दिया हो। लेकिन दर्शन शास्त्र के गोल्ड मेडलिस्ट और सियासत की हवा का रुख भांपने में विशेषज्ञता हासिल शिवराज सिंह चौहान के मुंह से ऐसी बात 13 साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में पहले कभी नहीं निकली। तीसरे दिन तस्वीर काफी कुछ साफ हो गई। अमित शाह ने साफ कह दिया कि चुनाव सिर्फ शिवराज सिंह के चेहरे की दम पर नहीं होंगे। शायद यह बात शिवराज सिंह को पहले समझाई जा चुकी होगी और भोपाल में यह बात पार्टी के उन कार्यकर्ताओं को समझा दी गई जिन्हे चुनाव में जिम्मेदार की भूमिका निभानी है। कभी चुनावी जीत का पर्याय माने जाने वाले शिवराज सिंह के चेहरे पर पार्टी को भरोसा क्यों नहीं रहा... इसकी तलाश में जाने पर तमाम कराण मिल जाएंगे, लेकिन मुद्दा यह है कि मुख्यमंत्री उन चेहरों को अभी भी नहीं पहचान पा रहे हैं जिन्होंने शिवराज सिंह चौहान के चेहरे की आभा, विश्वास और भरोसे को बीते कुछ दिनों में पलीता लगा दिया है। दर्शन शास्त्र में गोल्ड मेडलिस्ट होने के बाद भी वे नहीं समझ पाए रहे हैं कि...सचिव,बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।राजधर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास। लेकिन अमित शाह ने बहुत जल्दी सब को पहचान लिया और वे बातों ही बातों में बहुत बड़े बदलाव का संकेत दे गए। समझने वाले जब तक इस इशारे की गंभीरता को समझ पाएंगे तब तक सियासत की दरिया में काफी पानी बह गया होगा। 

 

अजय त्रिपाठी, स्टेट हेड IBC 24, मप्र


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