जनता मांगे हिसाब: IBC24 की चौपाल में मस्तूरी के मुद्दों की गूंज

Reported By: Abhishek Mishra, Edited By: Abhishek Mishra

Published on 12 May 2018 04:52 PM, Updated On 12 May 2018 04:52 PM

सफर की शुरूआत करते हैं...छत्तीसगढ़ के मस्तूरी विधानसभा क्षेत्र की...बिलासपुर जिले में आने वाली इस सीट के सियासी मूड को भांपना आसान नहीं है 120 किलोमीटर के इलाके में फैले इस चुनाव क्षेत्र के सियासी समीकरण बदलते रहे हैं ..इस बार क्या है सीट का सियासी मिजाज..बताएंगे आपको..लेकिन पहले इसके भौगोलिक स्थिति पर एक नजर डाल लेते हैं। 

बिलासपुर जिले में आती है मस्तूरी विधानसभा

अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है सीट

शहरी और ग्रामीण इलाकों को समेटे हुए क्षेत्र

मल्हार जैसा विश्व प्रसिद्ध क्षेत्र 

कुल मतदाता- 2 लाख 61 हजार 104

फिलहाल सीट पर कांग्रेस का कब्जा

दिलीप लहरिया हैं वर्तमान विधायक

मस्तूरी विधानसभा की सियासत

विधानसभा चुनाव में मस्तूरी का मैदान मारने के लिए सियासत के खिलाड़ी ...मुस्तैदी से तैयारी में जुट गए हैं ...भाजपा जहां राज्य सरकार के कामकाज गिना कर अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटी है..वहीं कांग्रेस भी लुभावने वादों के जरिए लोगों को रिझाने में लगी है ...जहां तक टिकट दावेदारों का सवाल है .. कांग्रेस में जहां वर्तमान विधायक दिलीप लहरिया का नाम सबसे आगे है....वहीं भाजपा में कई नेता टिकट की आस में सक्रिय नजर आ रहे हैं। 

खोंदरा से जौंधरा तक... मस्तूरी विधानसभा का नाम आते ही यही जुमला इस्तेमाल किया जाता है..दअसल खोंदरा और जौंधरा गांवों के बीच का करीब 120 किलोमीटर का इलाका इस विधानसभा क्षेत्र में आता है.. मस्तूरी संभवत प्रदेश का सबसे लंबा विधानसभा क्षेत्र है..अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व इस सीट की शक्ल 2008 के परिसीमन के बाद काफी बदल गई है ...और सीपत विधानसभा का एक बड़ा हिस्सा इसमें शामिल कर लिया गया है ..जिसके चलते यहां के राजनीतिक समीकरण काफी बदल गए हैं .. वैसे मस्तूरी के सियासी इतिहास की बात की जाए तो  मध्यप्रदेश के समय से ही महत्वपूर्ण रही हैं।

कांग्रेस के वर्चस्व वाली इस सीट से गणेश राम अनंत, बंसीलाल घृतलहरे जैसे बड़े लीडर चुनाव जीतकर मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री बने...1998 में पहली बार ये सीट भाजपा के कब्जे में आई, मदन सिंह डहरिया यहां से चुनाव जीते, लेकिन 2000 में छत्तीसगढ़ बनने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए। 2003 में मदन सिंह डहरिया को भाजपा के डॉक्टर कृष्णमूर्ति बांधी ने हराया और प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बने। 2008 में भी डॉ बांधी फिर चुनाव जीते, लेकिन 2013 में उन्हें दिलीप सिंह लहरिया ने हरा दिया

जाति समीकरण की बात की जाए तो यहां एससी और एसटी वोटर का बड़ा वर्ग मौजूद है..यही वजह है कि सीट पर बीएसपी का भी प्रभाव रहा है। बीएसपी को पिछले तीन चुनाव से यहां करीब 20 हजार वोट मिलते रहे हैं। 

 आगामी चुनाव को लेकर मस्तूरी में एक बार फिर सियासी पारा चढ़ने लगा है...नेता टिकट के लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं। कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों की बात करें तो वर्तमान विधायक दिलीप लहरिया का नाम सबसे आगे है...हालांकि ऐसा माना जाता रहा है कि लहरिया जोगी समर्थक थे..ऐसे में अगर पार्टी उनपर भरोसा नहीं करती है तो सतनामी समाज से  राजकुमार अंचल भी कांग्रेस से टिकट की दौड़ में शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर भाजपा में पूर्व विधायक और मंत्री डाक्टर कृष्णमूर्ति बांधी टिकट के मजबूत दावेदार हैं... बांधी इस समय अनुसूचित जाति मोर्चा के पदाधिकारी हैं और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से सतत संपर्क में हैं। दूसरा नाम चांदनी भारद्वाज का है, वे मस्तूरी जनपद की अध्यक्ष हैं और भाजपा की जांजगीर सांसद कमला पाटले की बेटी हैं। इनक अलावा लोकसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ चुके चंद्र प्रकाश सूर्या का नाम भी सूची में शामिल है है। प्रदेश की तीसरी पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जिन स्थानों पर मजबूत है, उनमें से एक सीट है मस्तूरी। कयास लगाया जा रहा है कि ऋचा जोगी यहां से चुनाव लड़ सकती हैं। राजेश्वर भार्गव यहां जेसीसीजे से दूसरे दावेदार हैं। कुल मिलाकर मस्तूरी में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला होना तय है..यदि बहुजन समाज पार्टी के वोट जोगी कांग्रेस की ओर जाते हैं तो भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी मुसीबत हो सकती है...

मस्तूरी के मुद्दे

मुद्दों की बात की जाए तो...मस्तूरी विधानसभा क्षेत्र में कई ऐसे मसले हैं ..जिनको दरकिनार करना सियासी पार्टियों के लिए कतई आसान नहीं होगा..वैसे मस्तूरी के ग्रामीण क्षेत्रों में खस्ताहाल सड़कें यहां सबसे बड़ा मुद्दा है..वहीं बिजली और पानी की किल्लत से भी जनता बेहाल है। 

शहरी और ग्रामीण परिवेश को समेटे मस्तूरी की समस्याएं भी अलग-अलग हैं..खोंदरा, जौंधरा, कनई, ओखर जैसे दूरस्थ इलाके हैं..जहां आज भी पहुंच मार्ग की समस्या है...बिजली-पानी की दिक्कते हैं..वहीं मस्तूरी से मल्हार, पचपेड़ी की ओर चलें तो मुख्य सड़क का निर्माण तो हुआ है  लेकिन सड़क के दोनों तरफ जो गांव बसे हैं वहां तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है या है भी तो बेहद खस्ताहाल। बारिश के दिनों में कई गांवों से अभी भी संपर्क टूट जाता है। ग्रामीण इलाकों में पानी की कमी भी मस्तूरी का बड़ा मुद्दा है।

पूरा इलाका मुख्यतः कृषि आधारित है, लेकिन खूंटाघाट डैम में पानी कम होने और नहर में पानी नहीं छोड़े जाने के कारण यहां की खेती संकट में है। नहर में पानी को लेकर ग्रामीण लगातार आंदोलन करते रहे हैं।  निराश्रित पेंशन में हुआ बड़ा घोटाला भी यहां प्रमुख चुनावी मुद्दा होगा..  मस्तूरी में हैवी ट्रैफिक एक बड़ी समस्या है जिससे लगातार दुर्घटनाएं होती हैं। धूल के गुबार चारों ओर फैले रहते हैं..इनके अलावा रोजगार और स्वास्थ्य सहित कई ऐसे मुद्दे हैं..जो आने वाले चुनाव को प्रभावित करेंगे। 

 

वेब डेस्क, IBC24

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