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कर्नाटक में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं,कुमारस्वामी और येदियुरप्पा ने किया सरकार बनाने का दावा

Last Modified - May 15, 2018, 9:48 pm

बेंगलुरु। कर्नाटक के कुरुक्षेत्र में विजेता बनकर उभरी है बीजेपी..हालांकि सत्ता से फिर भी वो दूर है । आंकड़े, विपक्ष और विश्लेषणों की धुंध को चीरते हुए एक बार फिर मोदी की करिश्माई लीडरशिप आगे आई है । उनका नेतृत्व.. हर तथ्य, तर्क और रणनीति पर भारी पड़ता दिख रहा है । कर्नाटक किस करवट बैठेगा ये अभी साफ नहीं..पर बीजेपी की कामयाबी को कम करके नहीं आंका जा सकता ।  गुजरात बचाकर और कर्नाटक में सबसे ज्यादा नंबर लाकर बीजेपी ने एक बार ये फिर दिखा दिया है कि चुनाव कैसे लड़े और जीते जाते हैं । 

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कुछ महीने पहले राहुल गांधी को लोगों ने शाबाशी दी कि उन्होंने गुजरात में बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी, उन्होंने कर्नाटक में भी जान लगा दी थी, इसका मतलब फ़िलहाल तो यही है कि मोदी-शाह के आगे राहुल का बेहतरीन प्रदर्शन भी पर्याप्त नहीं है...कर्नाटक में बीजेपी पहले भी जीत चुकी है, कर्नाटक की जनता ने अपना रिकॉर्ड कायम रखा है, 1988 के बाद से उन्होंने राज्य में सत्ता में किसी को दोबारा नहीं आने दिया है । हालांकि सिद्धारमैया के ख़िलाफ़ कितना रोष है या मोदी को कितना जनसमर्थन, इसे समझने के लिए बारीक़ विश्लेषण की ज़रूरत होगी ।

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देश में 2014 के बाद से जितने भी विधानसभा चुनाव हुए हैं..उनमें से अधिकतर में सत्ताधारी पार्टी हारी है...गुजरात और बिहार ज़रूर इसके अपवाद रहे हैं । कांग्रेस ने एक-एक करके राज्यों को खोया है और कर्नाटक छीनने के बाद बीजेपी उसी हालत में पहुँच गई है..जहां कांग्रेस अपने स्वर्णकाल में थी ।  

ये बात साफ़ है कि मोदी की लोकप्रियता बरक़रार है, उन्हीं के नाम पर ही चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं । ये भी कह सकते हैं कि भाजपा का प्रचार तंत्र और चुनाव तंत्र निश्चित तौर पर कांग्रेस से कई गुना बेहतर काम कर रहा है । ये भी माना जा सकता है कि लोग अब भी भाजपा के इस संदेश पर भरोसा कर रहे हैं कि देश विकास की राह पर है । बीजेपी के बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने का एक मतलब ये भी निकल सकता है कि दक्षिण में भी पीएम मोदी का महत्व बढ़ रहा है । ये बीजेपी के लिए जितनी बड़ी जीत है, उससे बड़ी हार कांग्रेस के लिए है, और ख़ास तौर पर राहुल गांधी के लिए... 2019 के चुनाव में एकजुट विपक्ष का नेतृत्व करने का हक़ राहुल को मिलेगा..इस पर संदेश के बादल और तेजी से मंडराने लगे हैं । दूसरी ओर कर्नाटक में बीजेपी की कामयाबी ने कांग्रेस के इस आत्मविश्वास को डिगा दिया होगा कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ वो जीत हासिल कर पाएगी । कर्नाटक के नतीजों की छाया 2019 के चुनाव पर भी दिखेगा..जो बहुत दूर नहीं । सच तो ये है कि कर्नाटक के चुनाव ने जो सबक दिए हैं..वो बीजेपी के लिए उपयोगी हैं..और कांग्रेस के लिए भी..। 

कर्नाटक का बाजीगर

हार कर भी जो जीत जाए..उसे फिल्मी भाषा में बाजीगर कहते हैं...तो क्या कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस को बाजीगर का तमगा दे सकते हैं..क्योंकि जिस तरह उसने जेडीएस को आगे कर बीजेपी को पटखनी देने की कोशिश की है..उसमें उसे कामयाबी मिलती दिख रही है । 

कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस की हार हुई..पर जीता कौन..पहले नंबर पर रहने वाली बीजेपी..या तीसरे नंबर पर आने वाली जेडीएस? सीट के आधार पर बीजेपी सबसे ऊपर है..पर इसके बाद भी वो सत्ता से दूर खड़ी है..तो दूसरी ओर जेडीएस के नंबर कम है..पर सौदेबाजी की ताक़त सबसे ज्यादा उसी के पास है । अपनी हार देखकर कांग्रेस ने हर हाल में बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने का फैसला किया..उसने एक ऐसा दांव खेला..जो पासा पलटने के लिए पर्याप्त है । जेडीएस के कुमारस्वामी लगातार ये कहते रहे हैं कि वो किंगमेकर नहीं बल्कि किंग की भूमिका में आना चाहते हैं..उनकी इस महात्वाकांक्षा को कांग्रेस ने एक डील में तब्दील करने का फैसला किया..वो जानती है..कि सत्ता से वो दूर हो चुकी है..पर उसके पास बीजेपी को रोकने का एक मौका है..इस मौके पर उसने चौका मार दिया...कांग्रेस ने बिना देर किए जेडीएस को ये प्रस्ताव दिया कि वो सरकार बनाए..और कांग्रेस उसका समर्थन करेगी ।

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अगर ये हो जाता है तो कर्नाटक में नंबर तीन पर रही पार्टी सरकार बनाएगी..और नंबर एक पर रही बीजेपी विपक्ष में बैठेगी । कांग्रेस के ऑफर को जेडीएस ने भी स्वीकार कर लिया है..नंबरों के लिहाज से दोनों दल मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में हैं..पर ये हो ही जाएगा..ये कोई अभी नहीं कह सकता..। एक तो राज्यपाल का फैसला अहम होगा..कि दूसरा बीजेपी का इस पर क्या रूख है..उसके पास कोई बी-प्लान है क्या..ये भी देखने की बात है..हालांकि बीजेपी के पास ज्यादा विकल्प है नहीं..क्योंकि जेडीएस से समर्थन लेकर ही वो यहां सरकार बना सकती है..पर जेडीएस के तेवर देखकर ये मुश्किल लग रहा है..ऐसे में बीजेपी के लिए हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि वो जीत तो गई..पर कुर्सी पर बैठ नहीं पाएगी । मतलब ये कि इतना पसीना बहाने के बाद बीजेपी के हाथ लगी भी तो विपक्ष की कुर्सी..।

 

वेब डेस्क, IBC24


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