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जनता मांगे हिसाब: बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछड़ा थांदला

Last Modified - May 20, 2018, 5:23 pm

अब बात करते हैं झाबुआ जिले की थांदला विधानसभा सीट की...जानेंगे क्या है आदिवासी बाहुल्य थांदला का सियासी मूड..पर पहले एक नजर थांदला विधानसभा की प्रोफाइल पर...

झाबुआ जिले में आती है विधानसभा सीट

ST वर्ग के लिए आरक्षित है सीट

गुजरात और राजस्थान दो राज्यों की सीमा से लगा क्षेत्र

थांदला और मेघनगर ब्लॉक शामिल

जनसंख्या- करीब 3 लाख 50 हजार

कुल मतदाता- 2 लाख 28 हजार 228

पुरुष मतदाता- 1 लाख 14 हजार 304

महिला मतदाता- 1 लाख 13 हजार 918

जातिगत समीकरण है बेहद अहम

सीट पर काबिज हैं निर्दलीय विधायक कल सिंह भाबर 

थांदला की सियासत

थांदला के सियासी समीकरण की बात की जाए तो..पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी से बगावत कर कल सिंह भाबर निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते..लेकिन इस बार वो फिर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं..वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है..जो पार्टी हाईकमान की मुश्किलें बढ़ा सकती है। 

थांदला की सियासत में पार्टी से ज्यादा चेहरा अहम रहता है...यहां की जनता चेहरे को देखकर वोट डालती है...इसका सबसे बड़ा उदाहरण वर्तमान विधायक कल सिंह भाबर हैं..जिन्होंने 2013 में बीजेपी से टिकट नहीं मिलने पर बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीता..1997 से आरएसएस से जुड़े रहने वाले कल सिंह भाबर 2003 में पहली बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते..2008 में उन्हें दोबारा टिकट मिला मगर वो चुनाव हार गए.

लेकिन 2013 में बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया...जिसके बाद वो निर्दलीय चुनाव लड़े और बीजेपी-कांग्रेस के प्रत्याशियों को हराकर विधायक बने ...कल सिंह भाबर एक बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं...इनके अलावा बीजेपी के संभावित उम्मीदावारों में रुस्तम चरपोटा और दिलीप कटारा का नाम भी शामिल है...वहीं कांग्रेस के संभावित दावेदारों की बात की जाए तो पूर्व विधायक वीर सिंह भूरिया का नाम सबसे आगे है...इनके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद कांतिलाल भूरिया के बेटे डॉक्टर विक्रांत भूरिया और गेंदाल डामोर का नाम भी इस लिस्ट में शामिल है..। 

थांदला के मुद्दे

3 लाख 50 हजार आबादी वाले थांदला विधानसभा में विकास की रफ्तार काफी धीमी नजर आती है..बेरोजगारी यहां सबसे बड़ा मुद्दा है...वहीं शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी पिछड़ा नजर आता है।  

राजस्थान और गुजरात की सीमा से सटे थांदला विधानसभा में सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी है. कागजों में तो थांदला का मेघनगर इलाका औद्योगिक क्षेत्र घोषित है. लेकिन स्थानीय लोगों को हीं यहां नौकरी नहीं मिल पाती है. बड़े उद्योगों में मशीनों से काम होने की वजह से स्थानीय मजदूरों को बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ रही है...पेय जल की गंभीर समस्या से भी थांदला के लोग जूझ रहे हैं...जहां ग्रामीण क्षेत्रों में पानी नहीं मिल पा रहा वहीं शहरी क्षेत्र के लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पानी की समस्या को दूर करने के लिए 12 साल पहले भीम सागर की घोषणा मुख्यमंत्री ने की थी...लेकिन अब तक वो सिर्फ आश्वासन ही है.

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लोगों ने घर तो बनवा लिए हैं लेकिन अब वो पैसों के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो अस्पताल में न तो पानी की व्यवस्था है और न ही बिजली की.. यहां तक की अस्पताल में बिस्तर भी हर किसी को नहीं मिल पाता. अब देखना ये है कि ये मुद्दे चुनावी मुद्दों में बदल पाते हैं या नहीं.


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