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उपचुनाव: सबक और संदेश

Created at - June 1, 2018, 1:25 pm
Modified at - June 1, 2018, 1:25 pm

11 राज्यों की 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीट में से 11 सीटों में विपक्ष को मिली जीत के 2 सरलीकृत निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहला ये कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लोगों का मोहभंग हो चुका है और दूसरा ये कि महागठबंधन की एकजुटता के आगे मोदी की दूसरी पारी अब मुश्किल है। हालांकि ये दोनों ही निष्कर्ष अर्द्धसत्य हैं लेकिन इसमें मोदी और शाह के लिए पूर्णसत्य संदेश जरूर छिपा है।

पहले बात पहले सरलीकृत निष्कर्ष यानी मोदी से होते मोहभंग की। पूर्ण बहुमत से आई बीजेपी अगर 4 सालों में 13 लोकसभा सीटों में से 8 को गंवाकर अल्पमत में आ जाए तो मोदी से मोहभंग का संदेश जाना लाजिमी है। गोरखपुर और उसके बाद कैराना में मिली पराजय को तो सीधे-सीधे हिंदुत्व की हार के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन हद ये है कि भाजपा खेमे की ओर से इस हार के लिए हिंदुओं की उदासीनता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कैराना के 12 लाख हिंदू मतदाताओं को ताना मारा जा रहा है कि उन्हें 5 लाख मुस्लिम मतदाताओं ने हरा दिया।

माफ कीजिए! हिंदुओं की आड़ में अपनी हार को मत छिपाइए। इन्हीं हिंदुओं ने पिछले चुनाव में अपने हिंदूहृदय सम्राट को छप्पर फाड़ वोट देकर पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनाया था। लेकिन हिंदूहृदय सम्राट तो प्रधानमंत्री की बजाए प्रधानसेवक बनकर सबको साथ में लेकर सबके विकास में जुट गए। हिंदुओं ने प्रधानमंत्री बनाया था राममंदिर बनाने के लिए लेकिन वो शौचालय बनाने में जुट गए। अब प्लीज, राममंदिर को अदालती मामला बताकर रामलला के प्रति अपने दायित्व की अनदेखी को जस्टीफाई करने की कोशिश मत करिएगा, क्योंकि अगर मामला अदालत में ही सुलझने का इंतजार करना था तो फिर आपको प्रधानमंत्री क्या ईदगाह के हामिद की कहानी सुनाने के लिए बनाया था? अब हामिद के उसी चिमटे से पड़ी मार को सहलाते रहिए।

भाजपा नेतृत्व ये समझने की कोशिश करे कि धारा 370, समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण जैसे दूसरे कोर इश्यू पर भी कोई सार्थक पहल नहीं होता देखकर उसका परंपरागत मतदाता भुन्नाए बैठा है। कोढ़ के ऊपर खाज ये कि आरक्षण और SC-ST एक्ट के मुद्दे पर मोदी अपने सवर्ण मतदाताओं को भी ‘फूफा’ बना बैठे। पहले से मुंह फुलाए फूफाओं को ये कहकर और खिसिया दिया गया कि मैं तो बाबा साहेब अंबेडकर की वजह से प्रधानमंत्री बना हूं। अब ऐसे में अगर खुन्नस खाए फूफा अगले चुनाव में आपको अंबेडकर के हवाले छोड़कर घर बैठ जाएं तो दोष मत दीजिएगा। फुफाओं की नाराजगी को भुनाने के लिए नोटा की मुहिम तो छेड़ ही दी गई है। कैसी विरोधाभाषी नादानी है कि जिस SC-ST एक्ट के मुद्दे पर अदालत का हवाला देकर आपको चुप्पी साध लेनी थी वहां तो आप अध्यादेश लाने की बेताबी दिखाते हैं और जिस राममंदिर के मुद्दे पर कानून बनाने की पहल करनी चाहिए वहां आप अदालत का हवाला देकर लाचारी जताते हैं।

तो क्या दूसरे सरलीकृत निष्कर्ष को सत्य माना जाए कि महागठबंधन की एकता मोदी की दूसरी पारी की राह में बैरियर साबित होगी? ये भी अर्द्ध सत्य है क्योंकि उपचुनावों में मतदान नितांत स्थानीय मुद्दों पर होता है जबकि आमचुनाव में राष्ट्रीय। उपचुनाव में जो गठबंधन बीजेपी की हार की वजह बना है, वही गठबंधन आमचुनाव में मोदी की जीत का आधार भी बन सकता है। ये मत भूलिए कि 2019 में चुनाव मोदी वर्सेस ऑल ही होना है। अध्यक्षीय शासन व्यवस्था नहीं होने के बावजूद तब चुनाव सीधे-सीधे प्रधानमंत्री चुनने के लिए हो रहा होगा और क्या ये बताने की जरूरत है कि इस कसौटी पर तब कौन खरा उतरेगा। जाहिर तौर पर तब ध्रुवीकरण मोदी और बाकी सबके बीच ही होगा।

लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि ध्रुवीकरण के लिए दोनों ध्रुवों का बराबर चार्ज होना जरूरी है। मोदी विरोधी ध्रुव तो चार्ज है, उद्देश्य भी स्पष्ट है- हर हाल में मोदी को रोकना। अब अपने समर्थक ध्रुव को चार्ज करने की जिम्मेदारी मोदी पर है कि वो इसे कितना पोलराइज कर पाते हैं। इसके लिए जरूरी है कि मोदी अपने समर्थक वर्ग में खुद को लायक बनाए रखें, वरना खिसियाये लोग लायक-नालायक नहीं देखते। और,हां! इस मुगालते में मत रहिएगा कि विकल्पहीनता में लोग झक मारकर आपको ही वोट देंगे। ये मत भूलिए कि इस हिंदुस्तान में लोग गुस्सा निकालने के लिए किन्नर को भी वोट दे आते हैं।तो अब जबकि आमचुनाव का काउंट डाउन शुरू हो

चुका है मोदी जी के पास अपने समर्थक वर्ग को देने के लिए कुछ ठोस होना जरूरी है। ठोस यानी कुछ मास्टर स्ट्रोक सा। वरना फील गुड तो अटल जी ने भी खूब कराया था, लेकिन अंजाम क्या निकला ये खुद मोदी जी भी बेहतर जानते हैं।

 

 

 

 

सौरभ तिवारी, असिस्टेंट एडिटर, IBC24


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