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देखिए राजिम विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड और जनता का मूड मीटर

Created at - June 5, 2018, 8:06 pm
Modified at - June 5, 2018, 8:06 pm

राजिम विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड जांचने आज हम पहुंचे हैं गरियाबंद जिले की राजिम विधानसभा सीट। राजिम का नाम आते ही सबसे पहले जेहन में जो आता हैं, उसमे पहला है राजिम कुंभ और दूसरे हैं अविभाजित मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री रहे श्यामाचरण शुक्लआस्था और सियासत दोनों के लिहाज से राजिम बेहद खास हैपहले बात कर लेते हैं सियासत की राजिम शुरू से ही 6कांग्रेस या कहें कि शुक्ल परिवार का सियासी गढ़ रहा हैश्यामाचरण शुक्ल के बाद यहां उनके बेटे अमितेष शुक्ल परिवार की सियासी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैंहालांकि बीच-बीच में बीजेपी ने इस सीट पर सेंध लगाने में सफलता हासिल की है।

कहते हैं आस्था और सियासत का गहरा नाता है और ये दोनों ही राजिम विधानसभा क्षेत्र को अहम बनाती हैंजहां राजीव लोचन मंदिर से जुड़ी आस्था ने आज राजिम को विश्व के नक्शे पर ला दिया है तो वहीं सालों से छत्तीसगढ़ के सबसे कद्दावर राजनीतिक शुक्ल परिवार के गढ़ के रूप में राजिम को एक खास सियासी पहचान मिली है

राजिम विधानसभा सीट से ही पंडित श्यामाचरण शुक्ल विधायक रहते मुख्यमंत्री रहे। कभी रायपुर जिले में आने वाली राजिम विधानसभा अब गरियाबंद जिले का​ हिस्सा है। इससे पहले राजिम की सियासत शुक्ल परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही हैश्यामाचरण शुक्ल ने यहां से पहला चुनाव 1962 में जीता और उसके बाद जीत की हैट्रिक लगाते हुए उन्होंने 1972 तक तीन चुनाव जीतेलेकिन 1977 में देशव्यापी कांग्रेस विरोधी लहर का असर यहां भी दिखा और जनता पार्टी के पवन दीवान ने श्यामाचरण शुक्ल को मात दीफिर 1980 में यहां से कांग्रेस के जीवनलाल साहू जीते

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1985 में यहां से बीजेपी ने अपना खाता खोला पुनीत राम साहू ने कांग्रेस के जीवन लाल साहू को मात दीलेकिन 1990 में श्यामाचरण शुक्ल ने फिर यहां से वापसी की उसके बाद एक फिर जीत की हैट्रिक लगाते हुए 1998 तक लगातार तीन चुनाव जीतेउनके निधन के बाद 2000 में यहां उपचुनाव हुए और कांग्रेस ने उनके बेटे अमितेष शुक्ल को मैदान में उताराजिन्होंने अपने परिवार की परंपरा को कायम रखते हुए सीट पर जीत दर्ज कीलेकिन राज्य बनने के बाद 2003 के चुनाव में बीजेपी के चंदूलाल साहू ने अमितेष को हराकर कांग्रेस को तगड़ा झटका दियाइसके बाद 2008 में अमितेष ने अपनी गलतियों को सुधारा और बीजेपी के संतोष उपाध्याय को हराकर एक बार फिर सीट को कांग्रेस की झोली में डाल दिया

2013 में बीजेपी ने संतोष उपाध्याय पर ही भरोसा जतायाइस बार संतोष उपाध्याय अमितेष शुक्ल को 18 सौ वोटों से मात देकर विधानसभा पहुंचे। 2 लाख 70 हजार 369 मतदाता वाले राजिम विधानसभा में करीब 65 फीसदी युवा मतदाता हैं। वहीं करीब 50 फीसदी OBC मतदाता, 30 फीसदी एसटी मतदाता, 10 फीसदी एससी और 10 फीसदी सामान्य वर्ग के मतदाता हैं। इसके बाद भी पिछड़े वर्ग का कोई नेता यहां पर शुक्ल परिवार के मुकाबले खड़ा नहीं हो पाया है शुक्ल परिवार को सामान्य वर्ग के प्रत्याशी ने ही मात दी।

सीट पर इस बार सियासी मुद्दों का अभाव नहीं है। हर बार स्थानीय विधायक का मुददा चरम पर होता हैलेकिन पिछली बार स्थानीय विधायक संतोष उपाध्याय होने के बाद भी कोई उल्लेखनीय काम इस सीट पर नहीं हुआएक बार फिर राजिम में सियासत का कुंभ लगने वाला हैदेखना है इसमें कौन भंवसागर मे फंसता है और किसे मोक्ष मिलता है

राज्य की सियासत में खास जगह रखने वाली राजिम में मुद्दों की कमी नहीं हैसिंचाई से लेकर बुनियादी सुविधाओं की कमी तो यहां मुद्दा बनेंगी हीलेकिन यहां एक मुद्दा ऐसा भी हैजिसे लेकर इन दिनों राजिम में खूब सियासत हो रही हैवो है कौशल्या माता का मंदिर, जिसे बनाने का दावा बीजेपी-कांग्रेस दोनों दल कर रहे हैं वैसे हर बार राजिम में स्थानीय बनाम बाहरी प्रत्याशी के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाता रहा हैलेकिन इस बार जनता नेताओँ के झांसे को समझ चुकी हैयही वजह है कि वो पिछले चुनाव के दौरान किए गए के वादों का हिसाब मांग रही है।

2013 का विधानसभा चुनाव राजिम में स्थानीय और बाहरी प्रत्याशी के मुद्दे पर लड़ा गया थाजिसमें बीजेपी प्रत्याशी संतोष उपाध्याय ने बाजी मारी थीलेकिन राजिम की जनता ने जिन वादों के नाम पर स्थानीय नेता संतोष उपाध्याय को अपना वोट दिया था वो वादे धरातल कहीं नजर नहीं आते वोटरों के मुताबिक बीते चुनाव में 2100 रुपए समर्थन मूल्य और 5 साल बोनस का वादा किया था, जो अबतक पूरा नहीं हुआइसके अलावा क्षेत्र में कई नहरों की लाइनें अधूरी है और खेती में उन्हें कोई फायदा भी नहीं मिल रहा

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धर्म नगरी राजिम में इस बार चुनाव में किसान के अलावा कौशल्या माता का मंदिर भी बड़ा सियासी मुद्दा बनने वाला हैकांग्रेस के संभावित प्रत्याशी अमितेश शुक्ल का भी कहना है कि पार्टी अगर चुनाव जीतती है तो संत कवि पवन दीवान की इच्छा जरूर पूरी करेगी और राजिम में कौशल्या माता का मंदिर बनाएगी, वहीं बीजेपी के विधायक संतोष उपाध्याय कह रहे हैं कि जमीन का निर्धारण होते ही माता कौशल्या मंदिर निर्माण का काम शुरू हो जाएगा।

राजिम में आने वाले चुनाव में भ्रष्ट्राचार और अफसरशाही को बढ़ावा देने का मुद्दा भी खूब सुनाई देने वाला है..कांग्रेस का आरोप है कि विकास के काम क्षेत्र में कमीशनखोरी का खेल जारी है..और नेताओं के संरक्षण में रेत की अवैध माइनिंग हो रही है।

इनके अलावा कुछ बुनियादी समस्याएं से भी लोग परेशान हैं..यहां सिंचाई के लिए कई नहर लाईनों का काम अधूरा पड़ा हुआ है। चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा इसे ही माना जा रहा है। पांडुगा और छुरा में अब तक नहर लाईनिंग का काम अधूरा है। इसके अलावा क्षेत्र के सबसे बड़े ग्राम पंचायत कोपरा को नगर पंचायत बनाने का मुद्दा भी तूल पकड़ रहा है।

गरियाबंद जिला का मुख्यालय भी राजिम विधानसभा में आता है। गरियाबंद में मूलभूत सुविधाओं का अभाव और अब तक अधूरे पड़े गौरवपथ को स्थानिय लोगों ने चुनावी मुद्दा बताया है।

कुल मिलाकर राजिम विधानसभा में चुनाव के चौसर पर जनता सियासी मुद्दों और नेताओं की चाल को करीब से देख रही है। चुनाव में जो नेता मुद्दे खड़े करने और मुद्दे निपटाने में कामयाब होगा, उसकी जीत निश्चित है।

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जैसे-जैसे चुनाव नजदीक का वक्त नजदीक आ रहा है। राजिम में सियासी हलचल तेज होने लगी है। नेता विधायक का टिकट पाने के लिए जोड़-तोड़ में जुट गए हैं। दोनों दलों से कई नेता टिकट के लिए ताल ठोंक रहे हैं। बीजेपी में इस बार दावेदारों की लंबी फेहरिस्त नजर आ रही है। मौजूदा विधायक संतोष उपाध्याय के अलावा सांसद चंदूलाल साहू और जिला पंचायत अध्यक्ष श्वेता शर्मा भी टिकट की रेस में शामिल हैं। वहीं कांग्रेस के खेमे से विधायक की दावेदारी में शुक्ल परिवार से अमितेश के अलावा भी पार्टी के कई स्थानीय नेता दावेदारी कर रहे हैं।

राजीम की सियासत आज भी श्यामाचरण शुक्ल के प्रभाव से उबर नहीं पाई है। बीजेपी के दावेदारों को स्थानीय बनाम बाहरी की लड़ाई ने पहचान दी तो कांग्रेस के नेता शुक्ल परिवार के प्रभाव में चाहकर भी विरोध नहीं कर पा रहे हैं। दोनों दलों में दावेदार कम नहीं हैं। फर्क इतना है कि, कांग्रेस में कोई खुलकर कुछ कह नहीं रहा और बीजेपी के दावेदार शब्दों की बाजीगरी कर चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं।

कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों की बात की जाए तो पिछला चुनाव हारे अमितेश शुक्ला ही प्रबल दावेदार हैं। अमितेश इस सीट से पहले भी विधायक और मंत्री रह चुके हैं। लेकिन अमितेश शुक्ला की सियासत अभी भी श्यामाचरण शुक्ल के नाम पर ही चल रही है। यही वजह है कि अब कांग्रेस में कई दावेदार स्थानीय प्रत्याशी को मौका देने की बात कर रहे हैं। पूर्व जिलाध्यक्ष बाबूलाल साहू का नाम भी इस सूची में शामिल है।

वहीं दूसरी ओर बीजेपी में दावेदारों की फेहरिस्त लंबी है। लेकिन मौजूदा विधायक संतोष उपाध्याय अभी भी इस सीट से स्वभाविक उम्मीदवार हैं। इसके अलावा सांसद चंदूलाल साहू भी इस सीट से दावेदार हैं, हालंकि वे खुद को दावेदार नहीं मानते। लेकिन पार्टी की इच्छा होने पर चुनाव लड़ने की बात कहते हैं। इसी सीट से जिला पंचायत गरियाबंद की अध्यक्ष डॉ. श्वेता शर्मा भी टिकट के लिए ताल ठोक रही है। श्वेता शर्मा को बीते चुनाव में टिकट मिलने की संभावना थी, लेकिन आखिरी वक्त में इनका नाम कट गया। बाद में निर्दलीय पर्चा भरने के बाद भी श्वेता शर्मा ने बीजेपी के लिए काम किया और उनकी पार्टी में वापसी हुई। 40 फीसदी से अधिक साहू वोटों को ध्यान में रखकर बीजेपी इस सीट से जिलाध्यक्ष डॉ. रामकुमार साहू और इलाज वाले बाबा के नाम से प्रसिद्द डॉ. रूपसिंग साहू को चुनाव में उतार सकती है।

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कुल मिलाकर धर्म नगरी राजिम में 2018 के सियासी संग्राम की तैयारी हो चुकी है। दोनों दल के दावेदार स्थानीय बनाम बाहरी के मुद्दे को लेकर टिकट पाने की जुगाड़ कर रहे हैं। यानि चुनाव से पहले राजिम में चुनावी घमासान मचना तय है।

 

वेब डेस्क, IBC24


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