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बिल्हा विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, देखिए जनता का मूड-मीटर

Created at - June 26, 2018, 7:35 pm
Modified at - June 26, 2018, 7:35 pm

बिल्हा। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है छत्तीसगढ़ के बिल्हा विधानसभा सीट के विधायक की। रायपुर-बिलासपुर हाईवे के दोनों ओर करीब 30 किलोमीटर में फैली है बिल्हा विधानसभा। यहां पिछड़े आदिवासी गांव हैं तो चमचमाती सड़कों और शापिंग काम्पलेक्स वाले शहरी क्षेत्र भी आते हैं। यहां सिरगिट्टी, तिफरा जैसे इंडस्ट्रीज इलाके हैं तो यदुनंदन नगर से लेकर चकरभाठा तक कई बड़ी कॉलोनियां भी आती है। मुंगेली जिले का पथरिया, सरगांव भी इसी विधानसभा में है। इतने अलग-अलग तरीके की आबादी को अपने में समेटे बिल्हा में मुद्दे, समस्याएं, शिकायतें भी अलग अलग है।

चुनावी साल है तो बिल्हा में एक बार फिर सियासी पारा चढ़ने लगा है। नेता और सियासी पार्टियां जनता को लुभाने नए-नए हथकंडे अपनाने लगे हैं। कोई दीवारों पर नारों और स्लोगनों के जरिए प्रचार प्रसार कर रहा है तो कोई जनता के बीच हाजिरी लगाकर उनका दिल जीतने की कोशिश में लगा है। जाहिर है रायपुर-बिलासपुर हाइवे के दोनों ओर करीब 30 किमी के दायरे में फैले बिल्हा विधानसभा में समस्याओँ की कोई कमी नहीं है। बुनियादी समस्याओँ के अलावा रिहायशी इलाकों में पानी की समस्या बरसों से बनी हुई है, जिसे लेकर स्थानीय लोगों में काफी नाराजगी है।

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मुंगेली जिले का पथरिया और सरगांव ब्लॉक का इलाका भी इसी विधानसभा में आता है। पथरिया की बात की जाए तो यहां पीने के पानी, सिंचाई व्यवस्था और सरकारी योजनाओं का ठीक तरह से क्रियान्वयन नहीं होना बड़ी समस्या है। वहीं सरगांव से बिल्हा और हिर्री में इस बार अवैध उत्खनन बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा। खनिज माफियाओं ने चूना पत्थर, डोलोमाइट, मुरुम, और मिट्टी के अवैध खनन से पूरा इलाका उजाड़ दिया है। वहीं हिर्री से आगे तक फोरलेन और फ्लाई ओवर बनाने के लिए बड़े पैमाने पर खेतों का अधिग्रहण किया गया। मकान तोड़े गए, लेकिन मुआवजा नहीं मिला, जिसे लेकर लोगों के पास शिकायतों की लंबी लिस्ट है।

इन बड़े मुद्दों के अलावा बिल्हा में कुछ बुनियादी समस्याएं भी हैं जो मौजूदा विधायक की मुश्किलें बढ़ा सकती है। विधानसभा क्षेत्र में आने वाले सिरगिट्टी, तिफरा इलाके में जमीन पर बेजा कब्जा, उद्योगों की कमी और बेरोजगारी भी बड़ी समस्या बनी हुई है। इसे लेकर मौजूदा विधायक पर बीजेपी ने कई आरोप लगाए हैं। जाहिर है चुनाव में विधायकों को इन सवालों के जवाब देने होंगे। उन्होंने भी इसकी तैयारी कर ली है। सियासत में दुश्मन के  हथियार को उसी के खिलाफ इस्तेमाल करने का पुराना रिवाज रहा है और बिल्हा में भी यही देखने मिल रहा है। अब ये सियाराम कौशिक का कौशल ही होगा जो वो सियासी जंग में दुश्मन के इस वार से बच निकलें।

बिलासपुर जिले में आने वाली बिल्हा विधान सभा क्षेत्र की सियासत भी काफी दिलचस्प रही है। पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले सियाराम कौशिक के जेसीसीजे का दामन थामने के बाद यहां की सियासत और उलझ गई है। कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में शामिल इस विधानसभा क्षेत्र में धरमलाल कौशिक ने दो बार चुनाव जीतकर जरूर बीजेपी का झंडा बुलंद किया है। कभी सवर्णों की सीट कही जाने वाली बिल्हा में अब कुर्मी वोटर ही प्रत्याशियों के किस्मत का फैसला करते हैं। 

बोदरी, सिरगिट्टी, पथरिया, सरगांव,तिफरा और बिल्हा। इन छह नगर पंचायतों से मिलकर बनी बिल्हा विधानसभा सीट का भूगोल जितना उलझा हुआ है, उतना ही उलझा हुआ है यहां का सियासी समीकरण।  कभी सवर्ण वर्ग के प्रभाव वाली इस सीट पर अब कुर्मी और पिछड़े वर्ग का असर देखा जा सकता है।  पिछले कुछ चुनावों के परिणाम भी इसकी तस्दीक करते हैं। इस सीट के बारे में एक धारणा ये भी है कि यहां से विधायक बनने वाला नेता सियासत में ऊंचा मुकाम हासिल करता है। राजनीतिक इतिहास बताता हैं कि इस सीट पर कांग्रेस को मात देना आसान नहीं रहा है।

बिल्हा के सियासी इतिहास की बात करें तो 1962 से 1985 तक लगातार कांग्रेस के चित्रकांत जायसवाल ने यहां पर पार्टी का झंडा बुलंद किया, लेकिन 1990 में अशोक राव ने कांग्रेस से बगावत की और जनता दल की टिकट पर चुनाव लड़कर यहां कांग्रेस के चित्रकांत जायसवाल को मात दी। हालांकि 1993 में अशोक राव दोबारा कांग्रेस में शामिल हो गए और बीजेपी के धरमलाल कौशिक को हराया। 1998 में पहली बार यहां से धरमलाल कौशिक ने बीजेपी का झंडा बुलंद किया। लेकिन 2003 में वे अपनी सीट बचाने में नाकाम रहे। उन्हें कांग्रेस के सियाराम कौशिक ने मात दी। 2008 में धरमलाल कौशिक ने सियाराम कौशिक को फिर से शिकस्त दी। 2013 में एक बार फिर कांग्रेस ने सियाराम कौशिक पर भरोसा जताया और वो विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक को हराने में सफल हुए। इस चुनाव में बीजेपी को जहां 72630 वोट मिले तो कांग्रेस को 83598 वोट मिले। इस तरह जीत का अंतर 10968 वोटों का रहा।

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बिल्हा विधानसभा के जातिगत समीकरण की बात करें तो यहां 45 फीसदी ओबीसी वोट यहां बड़ी सियासी ताकत है। कुर्मी, साहू, लोधी और यादवों का सियासी रूझान नतीजों को खास प्रभावित करता है। इसके अलावा करीब 25 फीसदी हरिजन और आदिवासी, 30 फीसदी ठाकुर-ब्राह्मण वोटर हैं जो नेताओँ की किस्मत तय करते हैं। कुल मिलाकर ये तय है कि 2018 में इस वीआईपी सीट पर सियासी घमासान भी जोरदार होगा। लिहाजा बीजेपी, कांग्रेस के साथ जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ और बीएसपी ने भी अपने दांव चलने शुरू कर दिए हैं।

बिल्हा विधानसभा क्षेत्र अपने आप में इसलिए भी खास हो जाता है। क्योंकि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक यहां से चुनाव लड़ते आए हैं। जाहिर है आने वाले चुनाव में वो एक बार फिर बीजेपी के संभावित उम्मीदवार होंगे, जबकि मौजूदा विधायक सियाराम कौशिक का जेसीसीजे के टिकट पर चुनाव लड़ना लगभग तय माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस से राजेद्र शुक्ल और जागेश्वरी वर्मा टिकट की रेस में शामिल है। वहीं आम आदमी पार्टी पहली बार अपनी किस्मत आजमाएगी।

बिल्हा की राजनीति में दो ऐसे चेहरे हैं, जिनकी भिडंत 2003 से हो रही है। यहां की जनता ने दोनों को बारी-बारी से मौका दिया है। लेकिन 2018 के सियासी महासमर के पहले यहां का सियासी समीकरण बदल गया है। 2003 से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ने वाले सियाराम कौशिक आगामी चुनाव में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं। मौजूदा विधायक को खुद की छवि पर भरोसा है और वो राज्य सरकार की नाकामियों को लेकर चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी में जुट गए हैं।

सियाराम कौशिक के जेसीसीसे में शामिल होने से कांग्रेस की मुश्किलें जरूर बढ़ गई है दरअसल सियाराम कुर्मी समाज का प्रतिनिधित्व करते थे। ऐसे में जोगी समर्थक सियाराम कौशिक के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी के सामने भी चुनौती है कि वो ऐसे कैंडिडेट का चुनाव करे जो बिल्हा के जाति समीकरण को साध सके। वैसे राजेंद्र शुक्ल का नाम इस रेस में सबसे आगे है। कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष राजेंद्र शुक्ल की टिकिट तकरीबन पक्की मानी जा रही है, लेकिन पथरिया ब्लाक के कांग्रेस पंचायत नेता घनश्याम वर्मा की पत्नी जागेश्वरी वर्मा भी इस दौड़ में शामिल है।

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वहीं पिछली बार सियाराम कौशिक के हाथों शिकस्त खाने वाले धरमलाल कौशिक का बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना तय है। धरमलाल कौशिक के मुताबिक कांग्रेसी विधायक चुनकर बिल्हा जनता पछता रही है और वो बदलाव चाहती है। कांग्रेस और बीजेपी के अलावा बीएसपी भी बिल्हा में अपना प्रत्याशी उतारती आई है लेकिन वो अनुसूचित जाति के नहीं रहते थे। पिछले चुनाव में बीएसपी प्रत्याशी को यहां महज ढाई हजार वोट मिले थे, लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी पहली बार बिल्हा से चुनाव लड़ेगी। आप के लोकसभा प्रभारी जसबीर सिंह चावला यहां से आप के उम्मीदवार हैं। जाहिर है सियाराम कौशिक के जेसीसीजे में शामिल होने के बाद बिल्हा में इस बार सियासी समीकरण काफी बदल गए हैं और इन सियासी पैंतरों के बीच यहां के कई अहम मुद्दे पीछे छूट सकते हैं।

वेब डेस्क, IBC24


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