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ईरानी डेरे के 112 परिवारों के लिए एक नई कॉलोनी, मिला नया आशियाना तो चेहरों पर आई रौनक

Created at - July 15, 2018, 2:10 pm
Modified at - July 15, 2018, 2:10 pm

रायपुर। कई पीढिय़ों पहले हजारों किलोमीटर दूर ईरान से भारत और फिर भारत के मध्यवर्ती राज्य छत्तीसगढ़ की धरती पर आए ईरानियों की घुमंतू जिंदगी को गुजर-बसर के लिए अब एक स्थाई बसाहट मिल गई है। ईरानियों का एक जत्था करीब एक सौ साल पहले वर्तमान छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर आया था, जहां आमापारा में ये लोग घोड़े आदि बेचने का कारोबार करते थे। रहने का कोई स्थाई ठिकाना नहीं था। लिहाजा ये परिवार यहां पंडरी इलाके में रायपुर से धमतरी जाने वाली छोटी लाइन की रेलवे पटरी के किनारे झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहने लगे। 

अब सौ बरस की लम्बी बदहाल जिंदगी से निकलकर ये परिवार एक खुशहाल भविष्य की ओर बढऩे लगे हैं।  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनकी सरकार की पहल पर इन घुमंतू ईरानियों को  एक बेहतरीन बसाहट में नया आशियाना मिल गया है। इसके साथ ही इस डेरे के 112 परिवारों के लगभग 500 सदस्यों को स्वयं के मकान में रहने का एक सुकून भरा अहसास होने लगा है। सिर्फ तीन महीने पहले तक ये लोग यहां पंडरी के पुराने रेल्वे स्टेशन के पास पटरी के किनारे झुग्गियों में रहा करते थे। उनकी इस झुग्गी बस्ती को ईरानी डेरे के नाम से पहचाना जाता था।

केंद्र सरकार की बीएसयूपी योजना के तहत रमन सरकार और नगर निगम के सहयोग से इन परिवारों को शहर से लगे हुए दलदल सिवनी के पास नगर निगम के कुशाभाऊ ठाकरे वार्ड में पक्के मकानों की एक साफ-सुथरी आवासीय कॉलोनी की सौगात मिली है। यहां जहां सीसी रोड, बिजली और पेयजल के लिए सार्वजनिक नल आदि की भी सुविधाएं दी गई हैं। प्रदूषित वातावरण से निकलकर लगभग ढाई महीने पहले मई 2018 में स्वच्छ वातावरण वाली इस कॉलोनी में आने पर इन परिवारों के बच्चों, युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं के चेहरों पर अब हमेशा मुस्कान नजर आती है।

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इस नवनिर्मित ईरानी कॉलोनी का नामकरण पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर किया गया है। कॉलोनी में इन परिवारों को छह अलग-अलग ब्लॉक्स में फ्लैट दिए गए हैं। प्रत्येक फ्लैट में किचन, हाल और लेट-बाथ की सुविधा है। बिजली के लिए ट्रांसफार्मर भी लगवाया गया है। इन परिवारों के पुरूष सदस्य शहर के मालवीय रोड के फुटपाथ पर चश्मा और घड़ी आदि बेचकर परिवार का खर्च चलाते हैं। ये लोग अपने घरों में फारसी भाषा में बातचीत करते हैं। पीढिय़ों से रायपुर शहर में रहने के कारण हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भी अच्छी तरह जानते हैं।

करीब 75 वर्ष की शाहजादी बानो कहती हैं-पंडरी के कच्चे मकान में बरसात से बचने के लिए हर साल उन्हें अपने खपरैल के छप्पर को प्लास्टिक शीट से ढकना पड़ता था। करीब 50 से 60 साल इसी तरह गुजार दिए। रमन सरकार ने इस नई कॉलोनी में उन्हें बीएसयूपी योजना के तहत पक्का मकान दिया है, तो अब यह समस्या नहीं रह गई है।

इसी ईरानी डेरे में जिन्दगी के संघर्ष की आंच में तपकर सुलेमान ईरानी और रूस्वा ईरानी जैसे उर्दू के मशहूर शायर भी हुए। इनमें से अली सज्जाद ' रूस्वा ईरानी' को छत्तीसगढ़ सरकार ने उर्दू भाषा और साहित्य की सेवा के लिए हाजी हसन अली सम्मान के रूप में राज्य अलंकरण से भी सम्मानित किया था। नौजवान जाफर अली ने पंडरी की झुग्गी में रहकर राजधानी के गुजराती स्कूल से बारहवीं पास किया। वे अब नई बसाहट के अपने पक्के मकान में रहते हैं और अपनी कॉलोनी के स्कूली बच्चों को नि:शुल्क ट्यूशन भी पढ़ाते हैं। सलाम हुसैन ईरानी एक अच्छे शायर और कव्वाल हैं। सरताज अली पहलवान हैं और दो बार क्रमश: वर्ष 1979 तथा वर्ष 2004 में रायपुर शहर में आयोजित कुश्ती प्रतियोगिता में चैम्पियन रह चुके हैं। पुरानी झुग्गी बसाहट में रहते हुए उन्होंने पहलवानी भी सीखी और अब शहर के अलग-अलग हिस्सों में दूसरों को कुश्ती का प्रशिक्षण दे रहे हैं। सरताज अली कहते हैं- पंडरी की पुरानी झुग्गी बस्ती में ही वो पले-बढ़े, जहां हालत ऐसी थी कि अगर सिर नगर निगम की जमीन पर है तो धड़ रेल्वे की जमीन पर। एक अनिश्चित भविष्य को लेकर उन्होंने बरसों अपने दिन किसी तरह गुजारे। अब सरकार से मिली इस नई कॉलोनी में काफी सुकून है।

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ईरानी जमात के मोहसिन अली सुहैल कहते हैं -पूर्वजों की धरती ईरान से अब इन परिवारों का कोई रिश्ता लगभग नहीं के बराबर रह गया है। ये लोग भारत और छत्तीसगढ़ की धरती पर रच -बस गए हैं। इस नई कालोनी के नन्हें बच्चे स्कूली पढ़ाई के लिए राजातालाब और अन्य वार्डों में जाते हैं। काम पर निकलने के बाद हर सुबह 9 बजे से देर शाम तक घण्टों फुटपाथ पर खड़े रहकर चश्मा और बेल्ट बेचने के कारोबार के बाद जब ईरानी पुरूष इस नई कालोनी के अपने घर लौटते हैं तो उन्हें एक सुकून भरी जिन्दगी का एहसास होने लगता है।

ईरानी कालोनी के निवासी सरताज अली कहते हैं-सरकार ने हमारे लिए पक्के मकानों की व्यवस्था कर दी है। उन्होंने कहा, इस नई कॉलोनी के पुरूषों को रोजी-रोटी कमाने के लिए हर दिन सुबह लगभग 9 बजे यहां से करीब दस किलोमीटर दूर मालवीय रोड जाना पड़ता है। बच्चों को भी स्कूल के लिए यहां से दूर जाना पड़ता है। उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए सिटी बस सेवा  का विस्तार ईरानी कॉलोनी तक करने का सुझाव दिया।

वेब डेस्क, IBC24


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