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स्वतंत्रता दिवस के मौके पर रमन ने 15वीं बार किया जनता को संबोधित, आप भी पढ़ें सीएम ने क्या है?

Created at - August 15, 2018, 11:57 am
Modified at - August 15, 2018, 11:57 am

 

रायपुर। मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह 72वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पंद्रहवीं बार जनता को संबोधित किया है। छत्तीसगढ़ी में रमन ने जनता शुभकामनाएं देकर भाषण की शुरुआत की। सीएम ने स्वतंत्रता संग्राम के सभी प्रसिद्ध और अनाम नायकों, राष्ट्र की सुरक्षा और नवनिर्माण में अमिट योगदान देने वाले वीरों और विविध प्रतिभाओं को स्मरण और नमन किया। छत्तीसगढ़ में आजादी की चिंगारी सुलगाने वाले आदिवासी वन अंचल के अमर शहीद गैंदसिंह, वीर गुण्डाधूर तथा मैदानी क्षेत्र में शहीद वीर नारायण सिंह की शहादत को भी याद किया। 

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अपने भाषण में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने प्रदेश में चलाई जा रही योजनाओं के बारे में जिक्र करते हुए बताया कि हमने अधिक लागत और उपज का कम दाम मिलने का चक्रव्यूह तोड़कर किसानों को लाभ पहुंचाया। किसान भाई विवश होकर मुझे बताते थे कि महंगा कृषि ऋण लेकर वे दुष्चक्र में फंस चुके हैं और उनके भविष्य के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। ऐसे किसान भाइयों को तात्कालिक लाभ देने के लिए हमने समय-समय पर अल्पकालीन ऋण माफ किया। 

अन्नदाताओं की खुशहाली के लिए दिल और सरकार के खजाने खोल दिए। कृषि उपजों की उत्पादकता, उत्पादन, उपार्जन और वितरण प्रणाली की पूरी श्रृंखला में सुधार का महाअभियान चलाया। सिंचाई पम्पों की संख्या 72 हजार से बढ़ाकर लगभग 5 लाख तक पहुंचा दी, निःशुल्क बिजली दी, धान खरीदी केन्द्रों की संख्या दोगुनी की, पारदर्शी और ऑन लाइन प्रणाली लागू की व तुरंत भुगतान का इंतजाम किया। बिना ब्याज के कृषि ऋण दिया। कई तरह के अनुदान और सब्सिडी दी। 15 वर्षों में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी और बोनस की राशि मिलाकर किसानों के घर लगभग 76 हजार करोड़ रूपए पहुंचाए।

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माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस वर्ष धान का समर्थन मूल्य, एकमुश्त 200 रूपए प्रति क्विटल बढ़ाने का जो अभूतपूर्व निर्णय लिया है, उससे हमारी धानी धरती के किसानी संस्कारों को बढ़ावा मिलेगा। ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ से जो सुरक्षा कवच दिया गया था, उसके कारण हमारे 5 लाख 63 हजार किसानों को 1 हजार 295 करोड़ रूपए से अधिक का दावा भुगतान मिला है, जो अपने-आप में एक कीर्तिमान है। वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य जरूर पूरा होगा।

पन्द्रह वर्ष पहले की अनुसूचित जनजाति तथा अनुसूचित जाति की तकलीफों को याद करके मन कांप जाता है। वन क्षेत्रों में ऐसे बिचौलिये सक्रिय थे, जो चार-चिरौंजी जैसे मेवों से बदलकर नमक देते थे। बाकी सुविधाओं के बारे में तो सोचना भी बहुत दूर की बात थी। हमने न सिर्फ आयोडीनयुक्त नमक देने की व्यवस्था की बल्कि प्रोटीनयुक्त चना, सोलर लैम्प, चरण पादुका आदि वस्तुएं देकर उनका विश्वास जीतने की शुरूआत की।

हमने प्रदेश में जिलों की संख्या 16 से बढ़ाकर 27 की, जिससे आदिवासी अंचलों में 7 नए जिले बने और प्रशासन को जनता के निकट पहुंचाने में मदद मिली। बस्तर और सरगुजा आदिवासी बहुल अंचलों को विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज जैसी समस्त संस्थाओं से सम्पन्न किया। प्राधिकरण बनाकर स्थानीय विकास की मांगों को तत्काल पूरा किया। अब प्रदेश के सर्वाधिक नवाचार सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, बलरामपुर-रामानुजगंज जैसे जिलों में हो रहे हैं। बीजापुर का अस्पताल, दंतेवाड़ा-सुकमा, कोरबा में एजुकेशन हब, बलरामपुर की इंटरनेट कनेक्टिविटी, आदिवासी जिलों में जैविक खेती से लेकर कड़कनाथ मुर्गा पालन और महिलाओं द्वारा ई-रिक्शा चालन जैसे अनेक कार्य नई इबारतें लिख रहे हैं। दंतेवाड़ा, सरगुजा और राजनांदगांव में भी बीपीओ शुरू हो गए हैं, जो न सिर्फ स्थानीय युवाओं को रोजगार दे रहे हैं, बल्कि उनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल करने में भी मददगार हो रहे हैं।

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हमने तेन्दूपत्ता संग्रहण पारिश्रमिक दर 450 रूपए से बढ़ाते हुए 25सौ रूपए प्रति मानक बोरा तक पहुंचा दिया है। तेन्दूपत्ता के कारोबार से होने वाली आय का बोनस भी बांटने लगे, इस तरह लगभग 4 हजार करोड़ रूपए का भुगतान किया गया। बीमा योजनाओं के साथ ही चिकित्सा, शिक्षा और विकास की तमाम सुविधाएं दी गई। महुआ बीज, साल बीज, चिरौंजी गुठली, हर्रा, लाख रंगीनी, लाख कुसमी और इमली की खरीदी भी समर्थन मूल्य पर करने की व्यवस्था की गई। छत्तीसगढ़ लाख उत्पादन में देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। वन अधिकार मान्यता पत्र वितरण के मामले में हम देश में पहले स्थान पर हैं। प्रदेश में लगभग पौने चार लाख वनवासी परिवारों को खेती के लिए साढ़े तीन लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि दी गई। पहले सरकार की अनेक सुविधाआंे का लाभ लाखों लोग इसलिए नहीं उठा पा रहे थे, क्योंकि उनकी जातियों के नाम का हिज्जा और उच्चारण हिंदी एवं अंग्रेजी में अलग-अलग था। हमने इस समस्या का समाधान किया। जिला कॉडर बनाकर अधिसूचित क्षेत्रों के स्थानीय युवाओं को सरकारी नौकरी दी।

छत्तीसगढ़ की विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के बारे में कौन नहीं जानता ? लेकिन भरत लाल के बारे में बहुत ज्यादा लोग नहीं जानते होंगे। भरत लाल, कबीरधाम जिले के बोड़ला विकासखण्ड के गांव मन्नाबेदी निवासी खेतिहर मजदूर का बेटा है, जिसका चयन ‘डीटीयू’ दिल्ली के लिए हुआ है। बीजापुर जिले के तेन्दूपत्ता श्रमिकों के बच्चे, चेरामंगी गांव के टमल कुमार वासन और कोयसगुड़ा निवासी ओयम सुकलाल भी अब मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे हैं। अंत्योदय की ऐसी सैकड़ों मिसालें ‘ईब से इंद्रावती’ तक देखी जा सकती है।

हमारे गांवों के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी परिवारों के सैकड़ों बच्चे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने के लिए लगातार चुने जा रहे हैं, इतना ही नहीं राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाएं उत्तीर्ण कर केन्द्र व राज्य के बड़े-बड़े पदों पर भी पहुंच रहे हैं, जिसकी एक नई मिसाल हमारे नवगठित गरियाबंद जिले के निवासी देवेश कुमार ध्रुव हैं, जिन्होंने यूपीएससी में देश में 47वां स्थान हासिल करके छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित किया है।

इन उपलब्धियों में हमारे अनेक नवाचारों ने बड़ी भूमिका निभाई है, जिसके तहत प्रयास, संकल्प, छू लो आसमान, यूथ हॉस्टल दिल्ली जैसी अनेक संस्थाएं स्थापित की गई हैं। राज्य के सभी जिलों में लाइवलीहुड कॉलेज की स्थापना, कौशल उन्नयन कानून और बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण की व्यवस्था के कारण हमारे युवा, देश की बड़ी-बड़ी संस्थाओं में रोजगार हासिल कर रहे हैं। बदलाव के सुखद अनुभवों के ऐसे हजारों उदाहरण आज छत्तीसगढ़ के जन-जीवन की नई पहचान बन गए हैं। सवाल यह नहीं है कि  2003 में किसने छŸाीसगढ़ को हताशा का, निराशा का, टूटे सपनों का और झूठे वचनों का प्रदेश बनाया था। बल्कि असली सवाल यह था कि उन हालातों में नौनिहालों और युवा सपनों की बगिया को कैसे महकाया जाए। इसलिए हमने शिक्षा की गुणवŸाा बढ़ाने के लिए ना सिर्फ स्कूलों की संख्या और सुविधाएं बल्कि शिक्षक-शिक्षिकाओं की संख्या भी बढ़ाई। जिसके कारण विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात राष्ट्रीय स्तर से भी बेहतर हो गया है। पढ़ाई का स्तर तेजी से सुधारने और नौनिहालों का भविष्य संवारने के लिए शिक्षाकर्मियों का नियमितिकरण किया। विकासखण्ड मुख्यालयों में ‘इंग्लिश मीडियम शासकीय प्रायमरी तथा मिडिल स्कूल खोलने, व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था भी स्कूल में करने जैसे कई नए कदम उठाए गए हैं।

हमारा युवा जगत अब उत्साह से लबरेज है क्योंकि अब, राष्ट्रीय स्तर के उच्च शिक्षण संस्थान का टोटा खत्म हो गया है। हमारे बच्चों को बाहर जाकर पढ़ने की मजबूरी खत्म हो गई है। आईआईटी, एनआईटी, ट्रिपल आईटी, एम्स, आईआईएम, केन्द्रीय विश्वविद्यालय आदि संस्थानों से प्रेरणा का संचार हो रहा है, जिससे छत्तीसगढ़ ‘शिक्षागढ़’ बन गया है, जहां बाहर के बच्चे भी पढ़ने आते हैं।

हमारे लगातार प्रयासों से प्रदेश में विश्वविद्यालयों की संख्या 4 से बढ़कर 13, मेडिकल कॉलेज 2 से बढ़कर 10, इंजीनियरिंग कॉलेज 14 से बढ़कर 50, कॉलेजों की संख्या 206 से बढ़कर 482, आदिवासी अंचलों में कॉलेजों की संख्या 40 से बढ़कर 71, उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात 3.5 से बढ़कर 16 हो गया है। युवा प्रतिभाओं की दमक अब सिर्फ शिक्षा ही नहीं बल्कि खेल-कूद, शोध-अनुसंधान और हर क्षेत्र में दिखाई पड़ने लगी है।

भाइयों और बहनों, मुझे विकास के चमकते हुए कलश पर मजदूरों का चेहरा दिखता है, विकास की बड़ी-बड़ी इमारतों में पसीने से लिखी हुई इबारतें दिखती हैं। इसलिए मुझे यह देखकर बहुत बुरा लगा था कि प्रदेश में श्रमिकों के कल्याण के लिए 56 वर्षों में कोई ठोस योजना ही नहीं बनाई गई थी। हमने 30 लाख से अधिक श्रमिकों का पंजीयन किया, जिससे प्रसूति से लेकर पोषण, सेहत, शिक्षा, प्रशिक्षण, उपकरण, विवाह, बीमा सुरक्षा, सिलाई मशीन, साइकिल, निःशुल्क टिफिन, गर्म पौष्टिक भोजन, कौशल उन्नयन, ई-रिक्शा खरीदने 50 हजार रूपए का अनुदान सहित 78 योजनाओं का लाभ दिया।  

सुख-दुःख का सबसे बड़ा पैमाना जीवन-मरण को ही माना जाएगा। यदि इस पैमाने पर छत्तीसगढ़ में आए बदलाव को देखें तो डेढ़ दशक पहले की उस स्थिति को याद करके आंखें नम हो जाती है कि जब एक लाख माताओं की प्रसूति के दौरान 365 माताएं अपने नवजात का चेहरा भी नहीं देख पाती थी। मातृ मृत्यु दर अब घटकर 173 हो गई है। इसी प्रकार शिशु मृत्यु दर भी 70 से घटकर 39 प्रति हजार हो गई है। बच्चों का सम्पूर्ण टीकाकरण 48 से बढ़कर 76 प्रतिशत तथा संस्थागत प्रसव की दर 18 से बढ़कर 70 प्रतिशत हो गई है।

 

 

वेब डेस्क, IBC24

 


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