आर्थिक समीक्षा में यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी, किसानों को सीधे नकद अंतरण का सुझाव

आर्थिक समीक्षा में यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी, किसानों को सीधे नकद अंतरण का सुझाव

आर्थिक समीक्षा में यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी, किसानों को सीधे नकद अंतरण का सुझाव
Modified Date: January 29, 2026 / 04:24 pm IST
Published Date: January 29, 2026 4:24 pm IST

नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) आर्थिक समीक्षा 2025-26 में यूरिया की खुदरा कीमत में ‘मामूली बढ़ोतरी’ करने की बात कही गई है — जो मार्च 2018 से 242 रुपये प्रति 45 किलो बैग पर अपरिवर्तित है — जबकि इसके बराबर राशि सीधे किसानों को प्रति एकड़ के आधार पर हस्तांतरित की जाएगी।

बृहस्पतिवार को संसद में पेश किए गए दस्तावेज़ में कहा गया है कि लागत सब्सिडी से आय सहायता की ओर प्रस्तावित बदलाव का लक्ष्य उर्वरक के उपयोग में तीन दशक पुराने असंतुलन को ठीक करना है, जो मिट्टी की गुणवत्ता को खराब कर रहा है और फसल की पैदावार को कम कर रहा है।

आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि भारतीय किसानों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटेशियम (एनपीके) अनुपात वर्ष 2009-10 में 4:3.2:1 से घटकर वर्ष 2023-24 में 10.9:4.1:1 हो गया है, जिसका मुख्य कारण सब्सिडी वाले यूरिया के माध्यम से अत्यधिक नाइट्रोजन का उपयोग है। कृषि संबंधी मानक अधिकांश फसलों और मिट्टी के प्रकारों के लिए 4:2:1 के करीब अनुपात का सुझाव देते हैं।

आर्थिक समीक्षा में कहा गया, ‘‘अधिक स्थायी सुधार के लिए उर्वरक के फैसलों को प्रशासित मूल्य विकृतियों के बजाय मिट्टी और फसल की आवश्यकताओं के आधार पर फिर से तय करने की आवश्यकता है’’ और पोषक तत्वों की कीमतों को कृषि संबंधी कमी को दर्शाने की अनुमति देकर किसानों की आय सहायता को उर्वरक खरीद से अलग करने का प्रस्ताव दिया गया है।

आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि अतिरिक्त नाइट्रोजन मिट्टी के कार्बनिक पदार्थ को कैसे कम करता है, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को तेज करता है, मिट्टी की संरचना को कमजोर करता है और भूजल में नाइट्रेट रिसाव को बढ़ाता है। कई सिंचित क्षेत्रों में, उर्वरक के प्रति उपज की प्रतिक्रिया स्थिर हो गई है या घट गई है, भले ही उपयोग की दरें बढ़ी हैं – यह आदानों के कम उपयोग को नहीं, बल्कि पोषक तत्वों के बीच उनके गलत आवंटन को दर्शाता है।

इसमें कहा गया, ‘‘समय के साथ, फसलों को पैदावार बनाए रखने के लिए उर्वरक की उत्तरोत्तर बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है, जिससे समान उत्पादन लाभ के बिना आदान की तीव्रता बढ़ जाती है।’’

हालांकि, भारत ने पोषक तत्व-आधारित मूल्य निर्धारण, यूरिया की नीम-कोटिंग और आधार-से संबद्ध बिक्री केन्द्र सत्यापन जैसे उपाय किए हैं, लेकिन ये मुख्य रूप से आपूर्ति पक्ष पर काम करते हैं, जिससे किसानों को पोषक तत्वों का चयन करते समय मुख्य आर्थिक संकेतक में कोई बदलाव नहीं होता है।

प्रस्तावित दृष्टिकोण के तहत, किसानों को समान कुल क्रय शक्ति प्राप्त होगी, लेकिन नाइट्रोजन की सापेक्ष कीमत उसकी कृषि संबंधी लागत के करीब आ जाएगी। जो लोग नाइट्रोजन का इस्तेमाल कुशलता से करते हैं, उन्हें पूरा अंतरण होने से फायदा होगा, जबकि खुदरा काउंटर पर कम खर्च करना पड़ेगा। ज़्यादा इस्तेमाल करने वालों को संतुलित उर्वरकीकरण, मिट्टी की जांच, नैनो-यूरिया और ऑर्गेनिक सुधारों की ओर जाने के लिए साफ प्रोत्साहन मिलेगा।

समीक्षा में कहा गया है कि भारत का डिजिटल कृषि बुनियादी ढांचा – आधार-सम्बद्ध उर्वरक बिक्री, एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से वास्तविक समय में निगरानी और पीएम-किसान मंच – ऐसे सुधार को परिचालन के स्तर पर संभव बनाता है।

इसमें, राष्ट्रीय विस्तार से पहले फसल और क्षेत्र-विशिष्ट मानक को निर्धारित करने के लिए सिंचित, वर्षा-आधारित और मिश्रित प्रणालियों को कवर करने वाले कृषि जलवायु क्षेत्रों में इस दृष्टिकोण को प्रायोगिक रूप से अपनाने का प्रस्ताव दिया गया।

आर्थिक समीक्षा में कहा गया,, ‘‘मुख्य उद्देश्य, उर्वरक के उपयोग को कम करना नहीं है, बल्कि इसे फसल की वस्तुस्थिति और मिट्टी की जरूरत के साथ फिर से तालमेल बिठाना है।’’ इसमें कहा गया है कि सही पोषक तत्वों का अनुपात उपज प्रतिक्रिया बढ़ाएगा और समय के साथ प्रति टन अनाज के लिए आवश्यक कुल उर्वरक को कम करेगा।

भाषा राजेश राजेश अजय

अजय


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