फोर्टिस हेल्थकेयर के पूर्व प्रवर्तक खुद को अवमानना ​​से मुक्त करने में विफल रहे: न्यायालय |

फोर्टिस हेल्थकेयर के पूर्व प्रवर्तक खुद को अवमानना ​​से मुक्त करने में विफल रहे: न्यायालय

फोर्टिस हेल्थकेयर के पूर्व प्रवर्तक खुद को अवमानना ​​से मुक्त करने में विफल रहे: न्यायालय

: , September 23, 2022 / 08:46 PM IST

नयी दिल्ली, 23 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा कि फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड के पूर्व प्रवर्तक मालविंदर सिंह और शिविंदर सिंह ‘अवमानना ​​से खुद को मुक्त करने में विफल’ रहे हैं। न्यायालय ने कहा कि दोनों ने एक मध्यस्थता अदालत के फैसले के तहत 1170.95 करोड़ रुपये (प्रत्येक के लिए अलग-अलग) देने का वास्तविक प्रयास नहीं किया। साथ ही उन्हें छह महीने जेल की सजा सुनाई।

अवमानना ​​की कार्रवाई जापानी फर्म दाइची सैंक्यो कंपनी लिमिटेड ने शुरू की थी। इसमें सिंगापुर की एक मध्यस्थता अदालत के आदेश के तहत अपने पक्ष में 3,600 करोड़ रुपये चुकाने की मांग की गई थी। यह वसूली मालविंदर मोहन सिंह और शिविंदर सिंह सहित 20 प्रतिवादियों से की जानी थी।

दाइची ने 3,600 करोड़ रुपये के मध्यस्थता आदेश की वसूली के लिए फोर्टिस-आईएचएच शेयर सौदे को भी चुनौती दी। इसके बाद फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड के पूर्व प्रवर्तकों को अदालती लड़ाई का सामना करना पड़ा।

फोर्टिस-आईएचएच सौदा दाइची और फोर्टिस हेल्थकेयर के पूर्व प्रवर्तकों के बीच कानूनी लड़ाई के कारण अटका हुआ है।

यह आरोप भी लगाया गया कि अवमानना ​​करने के अलावा सिंह बंधुओं ने अपने द्वारा नियंत्रित कंपनियों की हिस्सेदारी कम करने की एक सुनियोजित योजना तैयार की, ताकि मध्यस्थता आदेश को लागू न किया जा सके।

मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित, न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी और न्यायाधीश के एम जोसेफ की पीठ ने बृहस्पतिवार को अपने आदेश में कहा, ”जहां तक ​सिंह बंधुओं द्वारा निभाई गई भूमिका का संबंध है, मामला एक सीमित दायरे में है, यानी, क्या उन्होंने खुद को अवमानना ​​​​से मुक्त किया या नहीं? उक्त अवमानना कर्ता ​​ने अपने हलफनामे में जिन संपत्ति की पेशकश की है, वह इतनी कम है कि विदेशी मध्यस्थ के आदेश के तहत दाइची के पक्ष में दी जाने वाली राशि को पूरा करना असंभव है।”

न्यायालय ने आगे कहा, ”इस तरह हमारे पास यह मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है कि अवमानना कर्ता ​​संख्या नौ और 10 खुद को अवमानना ​​​​से मुक्त करने में विफल रहे हैं। वास्तव में, उनकी ओर से कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया गया है। फिर सवाल सजा की मात्रा के बारे में आता है। उनके कृत्यों को देखते हुए, हमारे विचार में अधिकतम सजा दी जानी चाहिए।”

पीठ ने अदालत की अवमानना ​​​​करने के लिए छह महीने के कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना राशि नहीं देने पर दो महीने की सजा और बढ़ जाएगी।

भाषा पाण्डेय रमण

रमण

 

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