सरकार के एथेनॉल पर ज़ोर से खाद्य सुरक्षा को खतरा : आर्थिक समीक्षा
सरकार के एथेनॉल पर ज़ोर से खाद्य सुरक्षा को खतरा : आर्थिक समीक्षा
नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) भारत के एथेनॉल-मिश्रित ईंधन कार्यक्रम, जो इसकी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का एक मुख्य आधार है, ने देश की 1.44 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बचाई है और अगस्त, 2025 तक लगभग 245 लाख टन कच्चे तेल की जगह ली है। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई है।
लेकिन समीक्षा ने चेतावनी दी है कि इस तेज़ विस्तार से अनचाहे परिणाम सामने आ रहे हैं।
सरकार की मूल्य निर्धारण नीतियां जो मक्का-आधारित एथेनॉल का समर्थन करती हैं, किसानों को दलहनों और तिलहनों से दूर कर रही हैं, जिससे दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और पोषण के बारे में चिंताएं बढ़ रही हैं।
एथेनॉल कार्यक्रम पारंपरिक चीनी-आधारित फीडस्टॉक से आगे बढ़कर खाद्य अनाज, विशेष रूप से मक्का को शामिल करने के लिए विस्तारित हुआ है, क्योंकि भारत अपने ई-20 मिश्रण लक्ष्य की दिशा में काम कर रहा है – जिसका अर्थ है पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाना।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2015-16 के बाद से मक्का की पैदावार में 48 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो वित्त वर्ष 2024-25 तक 3.78 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई है, जबकि सोयाबीन, सूरजमुखी, रैपसीड, मूंगफली और मोटे अनाज की पैदावार स्थिर रही है या घट गई है।
सरकार फीडस्टॉक के प्रकार के अनुसार वार्षिक एथनॉल की कीमतें तय करती है, जिसमें राज्य तेल कंपनियों द्वारा सुनिश्चित खरीद की जाती है। वित्त वर्ष 2021-22 और वित्त वर्ष 2024-25 के बीच, चावल या शीरा-आधारित एथेनॉल की तुलना में मक्का-आधारित एथेनॉल की कीमतें सालाना 11.7 प्रतिशत की तेज गति से बढ़ीं।
मूल्य निर्धारण संकेत ने काम किया। इसी अवधि में मक्का उत्पादन और खेती का रकबा पहले के मुकाबले सालाना क्रमश: 8.77 प्रतिशत और 6.68 प्रतिशत बढ़ा।
लेकिन दलहनों के उत्पादन और रकबे में गिरावट देखी गई, जबकि तिलहन और अन्य अनाजों में क्रमशः 1.7 प्रतिशत और 2.9 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई।
महाराष्ट्र और कर्नाटक में, मक्का अब ज़मीन और संसाधनों के लिए दालों, तिलहन, सोयाबीन, मोटे अनाज और कपास के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि पानी की अधिक खपत वाली धान की खेती से मक्का की ओर बदलाव की उम्मीद अभी तक पूरी नहीं हुई है।
इसमें कहा गया है कि दलहन और तिलहन भारतीय आहार और पोषण के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसानों की प्राथमिकता सूची में नीचे जा रहे हैं। समीक्षा ने चेतावनी दी है कि इस बदलाव से भारत की खाद्य तेल आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है और खाद्य कीमतों में अधिक अस्थिरता आ सकती है।
यह तनाव ऊर्जा बनाम भोजन में ‘आत्मनिर्भरता’ के प्रतिस्पर्धी लक्ष्यों को उजागर करता है।
आर्थिक समीक्षा ने अंतरराष्ट्रीय अनुभव को एक चेतावनी के तौर पर बताया। ओईसीडी-एफएओ के विश्लेषण से पता चलता है कि जब जैव-इंधन के नियमों और फीडस्टॉक-विशिष्ट कीमतों को नियमित रूप से समायोजित नहीं किया जाता है, तो वे फसल पद्धति और भोजन की कीमतों को स्थायी रूप से बदल सकते हैं।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया, ‘‘भारतीय अनुभव अब इसी तरह के शुरुआती चेतावनी संकेत दिखा रहा है।’’
कार्यक्रम के परिपक्व होने के साथ आर्थिक समीक्षा ने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को संतुलित करने वाली एक व्यापक रणनीति का आह्वान किया – जिसमें संभावित रूप से दलहनों और तिलहनों की पैदावार बढ़ाना, विशिष्ट कच्चे माल के पक्ष में बाजार की विकृतियों से बचना आदि शामिल है।
मुख्य लक्ष्य, खाद्य सुरक्षा या पोषण को कमजोर किए बिना एथेनॉल विस्तार के आर्थिक लाभ को बनाए रखना है।
भाषा राजेश राजेश अजय
अजय

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