नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक के हाल के कदमों से भारत को चालू वित्त वर्ष में 55 से 65 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह आकर्षित करने, रुपये को स्थिर करने और देश के भुगतान संतुलन को अधिशेष में लाने में मदद मिलने की उम्मीद है। भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक शोध विभाग की एक रिपोर्ट में यह कहा गया है।
रिपोर्ट ‘इकोरैप’ में कहा गया है कि केंद्रीय बैंक के फरवरी और जून, 2026 के कदमों को रुपये को स्थिर करने, घरेलू बॉन्ड बाजार को मजबूत करने, अधिक स्थिर विदेशी पूंजी को आकर्षित करने और बाह्य वित्त पोषण में आने वाली बाधाओं को कम करने के एक समन्वित प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।
केंद्रीय बैंक ने विदेशी पूंजी को आकर्षित करने और देश के भुगतान संतुलन को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं।
इन कदमों में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) को बढ़ावा देने के लिए रियायती विदेशी मुद्रा विनिमय दर अदला-बदली की सुविधा शामिल है। आरबीआई ने बैंकों को नए तीन से पांच साल के विदेशी मुद्रा प्रवासी (बैंक) खाता (एफसीएनआर) जमा जुटाने के लिए भी ऐसी ही सुविधा दी है।
एसबीआई रिपोर्ट के अनुसार, बाह्य वाणिज्यिक उधारी पर फरवरी के कदम संरचनात्मक और बाजार विकास को ध्यान में रखकर उठाये गये थे, जबकि जून में किये गये उपायों का मकसद विदेशी मुद्रा प्रवाह को आकर्षित करना और घरेलू ब्याज दरों को बढ़ाए बिना रुपये को सहारा देना है।
रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘करीब 55-65 अरब डॉलर का प्रवाह यह सुनिश्चित करेगा कि अनुमानित 16 प्रतिशत कर्ज वृद्धि के मुकाबले बैंक प्रणाली में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जमा वृद्धि बढ़कर लगभग 14.5-15 प्रतिशत हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, इसका मतलब यह होगा कि नियामकीय छूट को समायोजित करने के बाद कर्ज- जमा अंतर लगभग एक लाख करोड़ रुपये कम हो जाएगा और ब्याज दरों का ढांचा और नीचे आएगा।
आरबीआई ने डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में गिरावट को थामने के लिए नए एफसीएनआर (बी) जमा के लिए अमेरिका डॉलर-रुपया विदेशी विनिमय अदला-बदली सुविधा शुरू की है। ये जमा कम से कम तीन साल और अधिक से अधिक पांच साल की अवधि के लिए होंगे।
यह सुविधा सोमवार से लागू हुई और 16 अक्टूबर, 2026 तक खुली रहेगी।
भाषा रमण अजय
अजय