एसएंडपी ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया

एसएंडपी ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया

एसएंडपी ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया
Modified Date: March 25, 2026 / 10:42 am IST
Published Date: March 25, 2026 10:42 am IST

नयी दिल्ली, 25 मार्च (भाषा) एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है।

रेटिंग एजेंसी ने कहा कि निजी खपत, निवेश एवं निर्यात वृद्धि के प्रमुख चालक रहेंगे। हालांकि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ सकता है।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर अपनी नवीनतम त्रैमासिक आर्थिक टिप्पणी में एसएंडपी ने कहा कि नए भू-राजनीतिक तनाव और लगातार बने व्यापार संबंधी अनिश्चितता के जोखिम से भारत पर वस्तु कीमतों, व्यापार मात्रा एवं पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव के माध्यम से असर पड़ सकता है।

इसमें कहा गया कि यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारत में ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं, ताकि सब्सिडी लागत को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि कीमतों का पूरा असर उपभोक्ताओं तक पहुंचने के आसार नहीं हैं।

एसएंडपी ने कहा, ‘‘ हमारा अनुमान है कि 31 मार्च 2027 को समाप्त होने वाले वित्त वर्ष में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.1 प्रतिशत रहेगी, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में यह 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। मजबूत निजी खपत, निजी निवेश में मध्यम सुधार और ठोस निर्यात इसके मुख्य चालक होंगे।’’

एजेंसी ने 2025-26 के वृद्धि अनुमान को 0.4 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 7.6 प्रतिशत और 2026-27 के लिए 0.2 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है।

एसएंडपी के अनुसार, महंगाई के कम स्तर से सामान्य पर आने से वित्त वर्ष 2026-27 में इसके बढ़कर 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

ऊंची कच्चे तेल की कीमतों से व्यापार घाटा बढ़ने का अनुमान है, हालांकि सेवाओं के व्यापार में मजबूत अधिशेष से चालू खाते के घाटे को सीमित रखने में मदद मिलेगी।

एजेंसी का अनुमान है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) फिलहाल नीतिगत दरों को स्थिर रखेगा और रुख ‘तटस्थ’ बनाए रखेगा।

रिपोर्ट में कहा गया कि पश्चिम एशिया का संघर्ष एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं पर असर डालेगा क्योंकि इनमें से कई देश ऊर्जा के बड़े आयातक हैं और पश्चिम एशिया की आपूर्ति पर काफी हद तक निर्भर हैं।

एसएंडपी ने कहा, ‘‘ ऊंची ऊर्जा कीमतें क्रय शक्ति को कम करती हैं और घरेलू मांग को कमजोर करती हैं। भारत, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में ऊंची कीमतों के कारण सब्सिडी पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है, जिससे वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ेगा।’’

एजेंसी के आधारभूत अनुमान के अनुसार, ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत अप्रैल-जून तिमाही में 92 डॉलर प्रति बैरल और 2026 में करीब 80 डॉलर प्रति बैरल रहने के आसार हैं।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति में व्यवधान अप्रैल की शुरुआत तक बने रहने और उसके बाद धीरे-धीरे सामान्य होने की स्थिति के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है।

प्रतिकूल स्थिति में हालांकि यदि ऊर्जा बाजार में व्यवधान ज्यादा गंभीर और लंबे समय तक रहता है। साथ ही जून तिमाही में ब्रेंट कच्चा तेल औसतन 185 डॉलर प्रति बैरल और 2026 में करीब 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाता है तो भारत में ऊर्जा कीमतों से उत्पन्न होने वाली महंगाई के आकलन के बाद आरबीआई नीतिगत सख्ती कर सकता है।

एसएंडपी के अनुसार, ऐसी स्थिति में वर्ष की दूसरी छमाही में ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जा सकती है।

भाषा निहारिका मनीषा

मनीषा


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