अलग गुट बनाने के पार्टी सांसदों के किसी भी प्रयास को कानूनी बाधाओं का सामना करना होगा: तृणमूल नेता

अलग गुट बनाने के पार्टी सांसदों के किसी भी प्रयास को कानूनी बाधाओं का सामना करना होगा: तृणमूल नेता

अलग गुट बनाने के पार्टी सांसदों के किसी भी प्रयास को कानूनी बाधाओं का सामना करना होगा: तृणमूल नेता
Modified Date: June 7, 2026 / 08:38 pm IST
Published Date: June 7, 2026 8:38 pm IST

नयी दिल्ली, सात जून (भाषा) तृणमूल कांग्रेस नेताओं ने रविवार को कहा कि पार्टी सांसदों द्वारा अलग होकर एक गुट बनाने के किसी भी प्रयास को दलबदल-रोधी कानून के तहत महत्वपूर्ण कानूनी और प्रक्रियात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ेगा।

ऐसी खबरें हैं कि तृणमूल सांसदों का एक वर्ग पार्टी के संसदीय दल से अलग होने की संभावना के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहा है।

घटनाक्रम से परिचित सूत्रों ने बताया कि बागी नेता संसद के दोनों सदनों में सांसदों के बीच समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, और ऐसी अटकलें हैं कि यदि बागी गुट आवश्यक संख्या में सांसदों का समर्थन हासिल करने में कामयाब हो जाता है, तो वह मान्यता की मांग कर सकता है।

तृणमूल के एक नेता ने कहा कि पार्टी के पास वर्तमान में लोकसभा में 28 सदस्य हैं और दलबदल-रोधी कानून के तहत किसी भी कदम के लिए संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों, यानी 19 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।

हालांकि, पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी ने तर्क दिया कि इतनी संख्या हासिल करने से भी बागी गुट स्वतः ही एक अलग संसदीय समूह के रूप में कार्य करने में सक्षम नहीं हो पाएगा, और उसे किसी न किसी पार्टी में शामिल होना ही पड़ेगा।

नेता ने कहा, ‘‘कानून के अनुसार, यदि दो-तिहाई सांसद भी पार्टी छोड़ना चाहें, तो उनके पास एकमात्र विकल्प किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय करना है। अलग समूह बनाने का कोई प्रावधान नहीं है।’’

ऐसी भी अटकलें जताई जा रही हैं कि असंतुष्ट सांसद लोकसभा अध्यक्ष से संपर्क करके पार्टी के संसदीय नेतृत्व में बदलाव की मांग कर सकते हैं।

सूत्र ने बताया, ‘‘उस स्थिति में भी, लोकसभा अध्यक्ष निर्णय नहीं ले सकते हैं। संसदीय दल के नेता की नियुक्ति पार्टी द्वारा की जाती है और कोई भी बदलाव केवल पार्टी अध्यक्ष द्वारा ही किया जा सकता है।’’

सूत्र ने कहा कि इन अटकलों का मकसद सोमवार को होने वाली ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक से ध्यान भटकाना है।

इसी बीच, तृणमूल के एक अन्य नेता ने कहा कि राजनीतिक हलकों में कई अटकलों पर चर्चा हो रही है, लेकिन इसमें समय लग सकता है, क्योंकि संसद के मानसून सत्र में अभी काफी समय है।

नेता ने कहा, ‘‘मुख्य रूप से दो परिदृश्यों पर चर्चा हो रही है। एक तो पश्चिम बंगाल विधानसभा में रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व में हुई टूट के समान है, जहां विधायकों के एक वर्ग ने पार्टी से अलग होकर विद्रोह कर दिया था। दूसरा आम आदमी पार्टी (आप) के मामले के समान है, जब राघव चड्ढा और राज्यसभा सदस्यों के एक समूह ने दलबदल-रोधी प्रावधानों का पालन करते हुए पार्टी छोड़ दी और भाजपा में विलय कर लिया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘दोनों ही मामलों में, ये ऐसी प्रक्रियाएं हैं, जिनमें समय लगता है और कानूनी बाधाएं शामिल होती है।’’

सूत्रों ने बताया कि संसद में ऐसी ही स्थिति उत्पन्न होने से रोकने के प्रयास जारी हैं।

भाषा शफीक सुरेश

सुरेश


लेखक के बारे में