असम चुनाव: प्रचार अभियान के केंद्र में घुसपैठ, बेदखली अभियान और विकास प्रमुख मुद्दे रहेंगे

असम चुनाव: प्रचार अभियान के केंद्र में घुसपैठ, बेदखली अभियान और विकास प्रमुख मुद्दे रहेंगे

असम चुनाव: प्रचार अभियान के केंद्र में घुसपैठ, बेदखली अभियान और विकास प्रमुख मुद्दे रहेंगे
Modified Date: March 15, 2026 / 08:09 pm IST
Published Date: March 15, 2026 8:09 pm IST

गुवाहाटी, 15 मार्च (भाषा) असम विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही राज्य में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है और चुनावी मुकाबले को लेकर राजनीतिक दल अपने-अपने मुद्दों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में जुट गए हैं। आने वाले दिनों में विकास, कानून-व्यवस्था, पहचान की राजनीति और क्षेत्रीय मुद्दे चुनावी अभियान के मुख्य मुद्दों के रूप में उभरने की संभावना है।

घुसपैठ: राज्य में यह मुद्दा दशकों से राजनीति के केंद्र में रहा है। इसी के चलते असम आंदोलन हुआ था और बाद में असम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत सरकार का दावा है कि उसने इस समझौते के प्रावधानों को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। वहीं, विपक्ष चुनावी अभियान में इस बात को प्रमुखता से उठाने की तैयारी में है कि असमिया मूल निवासियों की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपायों को लागू करने के वादे को पूरा करने में सरकार नाकाम रही है।

घुसपैठ के मुद्दे को विपक्षी दल भी जोर-शोर से उठा रहा है। उसका आरोप है कि मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को “वापस भेजने” की कार्रवाई के नाम पर असली भारतीय नागरिकों को ही निशाना बनाया है और उन्हें कथित तौर पर परेशान किया जा रहा है।

कांग्रेस और उसके सहयोगी दल विशेष रूप से उन विधानसभा क्षेत्रों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने की रणनीति बना रहे हैं, जहां मुस्लिम मतदाता बहुसंख्यक हैं।

घुसपैठ से जुड़े दो प्रमुख मुद्दे-राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) का अद्यतन और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) भी चुनाव प्रचार के दौरान केंद्र में रहने की संभावना है। सत्तारूढ़ दल का कहना है कि सीएए का विरोध निराधार है, क्योंकि बांग्लादेश से आए बहुत कम हिंदुओं ने ही नागरिकता के लिए आवेदन किया है।

बेदखली अभियान: राज्य सरकार की कथित अतिक्रमणकारियों को हटाने की नीति भी चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनने जा रही है। इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों की बताई जाती है, जिसे लेकर सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं।

सत्तारूढ़ गठबंधन का दावा है कि उसने अतिक्रमण हटाते हुए जंगलों, मंदिरों और अन्य सरकारी जमीन को वापस हासिल किया है। वहीं, विपक्ष इसे “गंभीर मानवीय संकट” बताते हुए आरोप लगा रहा है कि इस कार्रवाई में घरों को ढहाए जाने से कई लोग बेघर होकर सड़कों पर रहने को मजबूर हो गए और अनेक परिवारों की आजीविका भी छिन गई।

बाल विवाह पर कार्रवाई: बाल विवाह के खिलाफ राज्य सरकार की सख्त कार्रवाई और बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी भी आगामी चुनाव में प्रमुख मुद्दा बन सकती है। कई मामलों में आरोपियों पर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की गई है।

सत्तारूढ़ गठबंधन इसे सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है, जबकि विपक्ष सरकार पर आरोप लगा रहा है कि इस कार्रवाई के जरिए राज्य में एक बार फिर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया है।

विकास परियोजनाएं और कल्याणकारी योजनाएं: राज्य सरकार चुनाव प्रचार के दौरान असम में शुरू की गईं प्रमुख विकास परियोजनाओं को प्रमुखता से सामने रखेगी। इनमें सड़कों, रेलवे, नए हवाई अड्डों और जलमार्गों से जुड़ी आधारभूत संरचना परियोजनाएं, टाटा का सेमीकंडक्टर संयंत्र और ‘एडवांटेज असम’ व्यापार सम्मेलन के दूसरे संस्करण के दौरान हुए विभिन्न समझौते शामिल हैं।

वहीं, विपक्ष का आरोप है कि विकास केवल चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित रहा है और इसके लिए मूल निवासियों की कथित तौर पर जमीन अधिगृहीत की गई है।

महिलाओं के लिए राज्य सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं भी चुनावी अभियान का अहम हिस्सा होंगी। इनमें महिलाओं को हर महीने 1,250 रुपये की आर्थिक सहायता, महिला उद्यमियों के लिए लाभ और स्वास्थ्य संबंधी पहल शामिल हैं। चूंकि राज्य के कुल मतदाताओं में लगभग आधी संख्या महिलाओं की है, इसलिए भाजपा और उसके सहयोगी दल इन योजनाओं को जोर-शोर से प्रचारित करेंगे।

हालांकि, विपक्ष का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी नहीं आई है और सरकारी लाभ भी समान रूप से नहीं दिया जा रहा है। भाजपा नीत गठबंधन चाय बागानों से जुड़े समुदाय को दिए गए लाभों को भी रेखांकित करने की कोशिश करेगा। यह समुदाय राज्य में एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है, जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का समर्थक रहा है, लेकिन 2016 के बाद से उसका झुकाव भाजपा की ओर हो गया है।

जुबिन गर्ग की मौत: लोकप्रिय गायक जुबिन गर्ग की सितंबर 2025 में सिंगापुर में हुई मौत और इस मामले में न्याय की मांग भी चुनावी चर्चा का अहम मुद्दा बन सकती है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा सरकार इस मामले में न्याय दिलाने को लेकर गंभीर नहीं है। वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि सरकार ने इस मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया, आरोपियों को गिरफ्तार किया और अब मामला अदालत में विचाराधीन है।

असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 64 विधायक हैं, जबकि उसकी सहयोगी असम गण परिषद (एजीपी) के नौ और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) के सात विधायक हैं। बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के तीन विधायक हैं।

विपक्ष में कांग्रेस के 26 विधायक हैं, जबकि ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के 15 सदस्य हैं। इसके अलावा एक विधायक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का है और एक निर्दलीय सदस्य भी विधानसभा में है।

भाषा खारी नेत्रपाल

नेत्रपाल


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