असम सरकार सीएए लाकर असम समझौते के महत्वपूर्ण खंड को दरकिनार कर रही : अजाप

असम सरकार सीएए लाकर असम समझौते के महत्वपूर्ण खंड को दरकिनार कर रही : अजाप

Edited By: , September 14, 2021 / 05:42 PM IST

गुवाहाटी, 14 सितंबर (भाषा) असम जातीय परिषद (अजाप) ने मंगलवार को आरोप लगाया कि संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) लाकर राज्य सरकार असम समझौते के ‘महत्वपूर्ण’ खंड पांच को दरकिनार कर रही है। यह खंड अवैध विदेशियों की पहचान के लिए निर्धारित तारीख से संबंधित है।

अजाप अध्यक्ष लुरिनज्योति गोगोई और महासचिव जगदीश भुइयां ने एक बयान में आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत सरकार उन ‘विदेशियों’ को तुष्ट करने के लिए अपने ही राज्य में असमिया लोगों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के लिए काम कर रही है जो संशोधित नागरिकता कानून के प्रावधानों के जरिए मतदाता बन जाएंगे।

उन्होंने कहा, ‘समझौते का खंड पांच विदेशियों की पहचान के लिए निर्धारित तारीख स्पष्ट करता है। लेकिन सीएए के लागू हो जाने पर यह अप्रासंगिक हो जाएगा। यह असम समझौते और उसकी भावना को समाप्त करने के समान होगा।’

बयान में उन्होंने कहा कि सरकार ने इस महत्वपूर्ण खंड की अनदेखी की जब उसने हाल ही में समझौते को लागू करने के लिए एक समिति का गठन किया।

राज्य सरकार ने सात सितंबर को अपने मंत्रियों और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के प्रतिनिधियों के साथ एक समिति बनाने की घोषणा की थी ताकि असम समझौते को लागू करने के लिए तीन महीने के भीतर एक रोडमैप तैयार किया जा सके। आसू समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक था।

मुख्यमंत्री कार्यालय ने उसी दिन एक बयान में कहा था कि बैठक में ‘खंड 6,7, 9 और 10 के विशेष संदर्भ में असम समझौते के प्रावधानों को लागू करने के लिए एक कार्यान्वयन ढांचा तैयार करने का फैसला किया गया।’’

समझौते के खंड पांच के तहत असम से अवैध विदेशियों का पता लगाने और उन्हें निर्वासित करने की अंतिम तिथि 25 मार्च, 1971 निर्धारित की गयी है।

अजाप ने आरोप लगाया कि विवादास्पद सीएए असम समझौते का उल्लंघन करता है क्योंकि इसमें ऐसे हिंदुओं, जैन, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों और पारसियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने की बात की गयी है जो बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पांच साल रहने के बाद 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए थे।

अजाप नेताओं का यह भी आरोप है कि 20 साल की अवधि में असमिया भाषी लोगों की संख्या में 10 प्रतिशत तक की कमी आएगी।

भाषा

अविनाश मनीषा

मनीषा