बचपन मलबे में दफन, कागज़ों पर जिंदा हैं रंग, युद्ध के शिकार बच्चों की याद में मार्मिक प्रदर्शनी

बचपन मलबे में दफन, कागज़ों पर जिंदा हैं रंग, युद्ध के शिकार बच्चों की याद में मार्मिक प्रदर्शनी

बचपन मलबे में दफन, कागज़ों पर जिंदा हैं रंग, युद्ध के शिकार बच्चों की याद में मार्मिक प्रदर्शनी
Modified Date: April 23, 2026 / 08:39 pm IST
Published Date: April 23, 2026 8:39 pm IST

नयी दिल्ली, 23 अप्रैल (भाषा) इन चित्रों में हर चीज को वैसे ही उकेरा गया है जैसी वह है…., पीली स्कूल बस, नीले बादलों तथा चमकते सूरज के नीचे एक डाल पर बैठे रंग-बिरंगे पक्षी और हरे व नीले रंगों से बना एक ‘ग्लोब’, जो हमारी पृथ्वी की बनावट और उसमें समाए उन देशों और रेखाओं को दिखाता है जिन्हें हम एक क्षण में अपनी आखों में नहीं उतार सकते।

ये सभी चित्र एक सामान्य और खुशहाल जीवन के हर उस छोटे क्षण को समेटे हुए हैं जिसे हम देखते और महसूस करते हैं। लेकिन, इस खूबसूरत परिदृश्य में एक ऐसी रिक्तता है, जिसके बिना ये सब अधूरे जान पड़ते हैं और वह कमी है उन बच्चों की, जिन्होंने अपनी कोमल कल्पनाओं और रंगों से इस नाज़ुक दुनिया को कागजों पर उतारा था।

ईरानी दूतावास में प्रदर्शित किए गए ये चित्र उन बच्चों के हैं जो 28 फरवरी को ईरान के मीनाब में एक स्कूल पर हुए बम हमले में मारे गए थे। इस हमले में पांच से सात साल की उम्र के लगभग 160 बच्चों की मौत हो गई थी।

यह वही दिन था जब ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच संघर्ष शुरू हुआ था।

इस सप्ताह की शुरुआत में ‘मिनाब चिल्ड्रेन स्टिल ड्रॉ द सन’ शीर्षक से आयोजित यह प्रदर्शनी संपन्न हुई। यह एक ऐसी कला प्रदर्शनी थी, जो सामान्य से अलग थी। इसमें रचनाओं का उत्सव कम और इनके सृजनकर्ताओं मासूम बच्चों को गंवाने का गम अधिक था।

ये चित्र ‘रेड क्रिसेंट सोसाइटी’ के दलों को मीनाब स्थित ‘शजरेह तैय्यबेह गर्ल्स एलीमेंट्री स्कूल’ के मलबे से बरामद किए गए स्कूली बस्तों में मिले, जिन्हें डिजिटल रूप से ‘स्कैन’ कर नयी दिल्ली स्थित ईरान के दूतावास सहित दुनिया भर के विभिन्न ईरानी राजनयिक मिशनों को भेजा गया।

इन सभी चित्रों में से अधिकांश के नीचे फारसी में एक पंक्ति लिखी है, जिसका मतलब है कि “हमारे बच्चे खुश रहें।”

प्रदर्शनी के विवरण में कहा गया ‘यह एक ऐसा स्कूल था जो अमेरिका और ज़ायोनी शासन के सैन्य हमले में पूरी तरह तबाह हो गया था। इन चित्रों को केवल उस स्थिति तक सुधारा जा सका है, जिससे इन्हें देखा और पहचाना जा सके।’

हॉल में प्रदर्शित 28 चित्र किसी मंझे हुए कलाकार की रचना नहीं, बल्कि उन मासूम हाथों की कलाकारी थे जिनका बचपन युद्ध की भेंट चढ़ गया। इन चित्रों में कहीं कहीं लहराता हुआ ईरान का झंडा तो कहीं चारों ऋतुओं की एक सटीक झलक थी, तो कहीं एक नटखट छोटी जादूगरनी।

वहीं, हॉल के एक अन्य हिस्से में बच्चों के लिए खोदी गई कब्रों की कतारों की तस्वीरें थीं, जहां एक वीडियो भी दिखाया जा रहा था, जिसमें मलबे में तब्दील हो चुके स्कूल को और मलबे से शवों को निकालते समय लोगों की दर्द भरी सिसकियां सुनाई दे रही थीं।

दीवार पर माकन निसिरी की भी एक तस्वीर थी। हमले के बाद स्कूल के एक पेड़ पर उसके जूते लटके मिले थे, लेकिन उसका शव कभी नहीं मिल सका।

प्रदर्शनी के अंतिम दिन इसे देखने आए पंडित विजय कुमार शर्मा ने भावुक स्वर में कहा, “निर्दोष बच्चों की हत्या आतंकी कृत्य है। इस दुनिया में मानवता से बड़ा कुछ भी नहीं है। मैं इस कठिन समय में ईरान और अपने मुस्लिम भाइयों के प्रति अपनी एकजुटता प्रकट करने के लिए यहां आया हूं।”

इन चित्रों के पास ही कई ‘व्हाइटबोर्ड’ रखे गए थे, जो आगंतुकों द्वारा हाथ से लिखे गए श्रद्धांजलि संदेशों से भरे थे।

भाषा प्रचेता पवनेश नरेश

नरेश


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