दिल्ली की अदालत ने ‘चेक बाउंस’ मामले में ‘कॉपी-पेस्ट’ फैसले को लेकर मजिस्ट्रेट को फटकार लगाई

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दिल्ली की अदालत ने ‘चेक बाउंस’ मामले में ‘कॉपी-पेस्ट’ फैसले को लेकर मजिस्ट्रेट को फटकार लगाई

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  • Publish Date - June 9, 2026 / 07:29 PM IST,
    Updated On - June 9, 2026 / 07:29 PM IST

नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने चेक बाउंस के एक मामले में आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को रद्द करते हुए कहा है कि अधीनस्थ अदालत का फैसला यांत्रिक ढंग से किए गए ‘‘कॉपी-पेस्ट’’ का नतीजा था, जो ‘‘दिमाग का कतई इस्तेमाल न किए जाने’’ को दर्शाता है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरगुरवरिंदर सिंह जग्गी ने शिकायतकर्ता जय प्रकाश नारायण की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया। यह याचिका परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत एक मामले में सतेंद्र सिंह को बरी किए जाने के खिलाफ दायर की गई थी।

अदालत ने छह जून के अपने आदेश में कहा, ‘‘प्रौद्योगिकी, ‘वर्ड प्रोसेसर’ और कंप्यूटर का आगमन न्यायपालिका के लिए प्रशासनिक रूप से सहायक होना चाहिए था ताकि न्यायिक मसौदा तैयार करने में दक्षता और गति आए, लेकिन इससे एक खतरनाक एवं अस्वीकार्य बुराई पैदा हो गई है, वह है- ‘कंट्रोल प्लस सी’ और ‘कंट्रोल प्लस वी’ (कॉपी-पेस्ट) न्यायशास्त्र।’’

उसने पाया कि मई 2024 में आरोपी को बरी करने वाले मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने वर्तमान मामले में साक्ष्यों की स्वतंत्र रूप से जांच किए बिना, उन्हीं पक्षों के बीच चेक बाउंस के एक अन्य मामले से तथ्यात्मक निष्कर्ष और कानूनी विश्लेषण हू-ब-हू उठा लिए थे।

अदालत ने कहा, ‘‘विवादित फैसला घोर विकृति, दिमाग का कतई इस्तेमाल न किए जाने और ‘वर्ड प्रोसेसर’ के ‘कॉपी-पेस्ट’ पर अविवेकपूर्ण निर्भरता के कारण दोषपूर्ण है।’’

शिकायत के अनुसार, नारायण ने जुलाई 2017 में सिंह को दो लाख रुपये का कर्ज दिया था। ऋण वापसी के लिए जारी किया गया चेक खाते में ‘‘पर्याप्त धनराशि नहीं होने’’ के कारण बाउंस हो गया, जिसके बाद कानूनी नोटिस भेजा गया और शिकायत दायर कराई गई।

अधीनस्थ अदालत ने सिंह को बरी करते हुए कहा था कि शिकायतकर्ता धनराशि उधार देने की अपनी वित्तीय क्षमता साबित करने में विफल रहा और साक्ष्यों में विसंगतियां थीं।

शिकायतकर्ता ने आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए दलील दी कि यह फैसला एक अलग मामले में दिए गए पूर्व के फैसले की हू-ब-हू नकल था, जिसमें अलग चेक और अलग तथ्य शामिल थे।

अपीलीय अदालत ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने एक अन्य चेक संख्या का जिक्र किया था और चेक के बाउंस होने का कारण ‘‘आहरणकर्ता के हस्ताक्षर भिन्न होना’’ बताया था, जबकि वर्तमान मामले में चेक ‘‘अपर्याप्त धनराशि’’ के कारण लौटाया गया था।

अदालत ने कहा कि जब अधीनस्थ अदालत रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का आकलन किए बिना किसी अन्य मामले से तथ्यात्मक विश्लेषण लेती है, तो ऐसा फैसला कानून की दृष्टि से टिका नहीं रह जाता और न्याय की विफलता के समान होता है।

भाषा

सिम्मी दिलीप

दिलीप

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