‘हाइपोस्पेडियास’ के मामलों पर डॉक्टर सतर्क, रसायनों और प्रदूषण की भूमिका की जांच
‘हाइपोस्पेडियास’ के मामलों पर डॉक्टर सतर्क, रसायनों और प्रदूषण की भूमिका की जांच
नयी दिल्ली, 28 जून (भाषा) गर्भावस्था के दौरान पर्यावरणीय प्रदूषण, हार्मोन के संतुलन को प्रभावित करने वाले रसायन और मातृ स्वास्थ्य से जुड़े कारक लगातार वैज्ञानिकों की जांच के दायरे में आ रहे हैं। शोधकर्ता नवजात लड़कों में पाई जाने वाली सबसे आम जन्मजात विकृतियों में से एक ‘हाइपोस्पेडियास’ को बेहतर ढंग से समझने का प्रयास कर रहे हैं।
‘हाइपोस्पेडियास’ एक जन्मजात विकृति है, जिसमें भ्रूण के विकास के दौरान मूत्रमार्ग (यूरेथ्रा) का छिद्र लिंग के सिरे पर बनने के बजाय उसके निचले हिस्से में विकसित हो जाता है।
आम तौर पर सर्जरी से इस स्थिति का इलाज किया जा सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरण से जुड़े संभावित कारणों की पहचान करना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बन गया है।
दुनिया भर में, ‘हाइपोस्पेडियास’ हर 150-200 लड़कों के जन्म में से लगभग एक को प्रभावित करता है। भारत में सालाना जन्म दर के आधार पर, विशेषज्ञों का अनुमान है कि हर साल लगभग एक लाख लड़के इस स्थिति के साथ पैदा हो सकते हैं।
गुरुग्राम के मेदांता-द मेडिसिटी में पीडियाट्रिक सर्जरी और पीडियाट्रिक यूरोलॉजी के निदेशक डॉ. संदीप कुमार सिन्हा ने कहा, “हाइपोस्पेडियास का पता लगाना आमतौर पर आसान होता है, क्योंकि इसमें मूत्रमार्ग का छेद लिंग के सिरे पर नहीं होता है।”
उन्होंने कहा, “कई मामलों में शिश्न का विकास पूरी तरह नहीं हो पाता है और लिंग नीचे की ओर मुड़ा हुआ हो सकता है।”
शुरुआत में ही बीमारी का पता चलने से समय पर इलाज हो पाता है। आम तौर पर इसमें पुन:निर्माण ऑपरेशन की जाती है, जिसका मकसद लिंग को सीधा करना और मूत्र मार्ग के छेद को लिंग के सिरे पर सही जगह पर लाना होता है।
डॉ. सिन्हा ने कहा, “सर्जरी की सफलता दर आमतौर पर ज़्यादा होती है, खासकर तब जब यह कम उम्र में की जाए।” उन्होंने कहा कि ज़्यादातर सर्जरी नौ महीने से दो साल की उम्र के बीच की जाती हैं, हालांकि मुश्किल मामलों में कई चरणों में ऑपरेशन की जरूरत पड़ सकती है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली में पीडियाट्रिक सर्जरी के प्रोफेसर (जिन्होंने ‘हाइपोस्पेडियास’ के जीनोमिक्स में शोध किया है) डॉ. प्रबुद्ध गोयल ने बताया कि भारत में हर दिन लगभग 800 लड़के इस स्थिति के साथ पैदा होते हैं। डॉ. गोयल ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि यह समस्या हर 125 जीवित पुरुष बच्चों के जन्म में से एक को प्रभावित करती है और दुनिया भर में जन्म के समय होने वाली सबसे आम कमियों में से एक है; साथ ही, इसके मामले चुपचाप लेकिन लगातार बढ़ रहे हैं।
डॉक्टर ‘हाइपोस्पेडियास’ के तीन मुख्य कारण बताते हैं। पहला कारण अनुवांशिक है।
दूसरा कारण है गर्भावस्था के आठवें और सोलहवें हफ़्ते के बीच के अहम समय में पुरुष हार्मोन (एंड्रोजन) का पर्याप्त मात्रा में न मिल पाना, जब बच्चे के जननांग बन रहे होते हैं।
तीसरी और तेजी से चिंता का विषय बनती जा रही बात है – पर्यावरण में मौजूद ऐसे रसायन के संपर्क में आना जो एंडोक्राइन सिस्टम (ईडीसी)(हार्मोन बनाने वाला तंत्र) को नुकसान पहुंचाते हैं।
डॉ. गोयल ने कहा, “हमारे शरीर का कामकाज हार्मोन से नियंत्रित होता है और ईडीसी इन रासायनिक वाहकों की नकल कर सकते हैं या उन्हें रोक सकते हैं।” उन्होंने कहा, “ये रोज़मर्रा की चीज़ों में पाए जाते हैं, जैसे खाना गर्म करने में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक, कीटनाशकों के अवशेष, औद्योगिक प्रदूषण, दूषित पानी और भारी ट्रैफ़िक वाले इलाके।”
डॉ. गोयल ने कहा कि समाज पर इसके असर को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। ‘हाइपोस्पेडियास’ के बढ़ते मामले एक तरह से जैविक संकेत या चेतावनी हैं कि हमारे खान-पान की व्यवस्था, शहरों की हवा की गुणवत्ता, औद्योगिक नियमों और प्लास्टिक पर हमारी निर्भरता पर अभी जितना ध्यान दिया जा रहा है, उससे कहीं ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है।
बचाव पूरी तरह से पक्का नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं है। गर्भवती महिलाओं को सलाह दी जाती है कि वे प्लास्टिक के डिब्बों में खाना गर्म करने से बचें, जहां हो सके ऑर्गेनिक चीज़ें चुनें, कीटनाशकों वाली जगहों से दूर रहें और समय पर व नियमित रूप से प्रसव-पूर्व देखभाल का लाभ लें।
‘एनवायरनमेंटल हेल्थ पर्सपेक्टिव्स’ और ‘ह्यूमन रिप्रोडक्शन अपडेट’ में छपे अध्ययन में कुछ ईडीसी के संपर्क में आने (खासकर जन्म से पहले) और पुरुषों में प्रजनन संबंधी असामान्यताओं (जैसे हाइपोस्पेडियास) के बीच संबंध बताए गए हैं, हालांकि इनके बीच सीधे कारण-प्रभाव का संबंध साबित नहीं हुआ है।
पर्यावरण से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंता के बावजूद, डॉक्टर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अगर ‘हाइपोस्पेडियास’ का पता जल्दी चल जाए और उसका इलाज हो जाए, तो बच्चों के लिए इसके नतीजे आम तौर पर बहुत अच्छे होते हैं।
भाषा प्रशांत दिलीप
दिलीप

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