पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने औपनिवेशिक शासन के ‘राजनीतिक मिथक’ पर प्रहार करने वाली पुस्तक की सराहना की

पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने औपनिवेशिक शासन के ‘राजनीतिक मिथक’ पर प्रहार करने वाली पुस्तक की सराहना की

पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने औपनिवेशिक शासन के ‘राजनीतिक मिथक’ पर प्रहार करने वाली पुस्तक की सराहना की
Modified Date: February 7, 2026 / 01:51 pm IST
Published Date: February 7, 2026 1:51 pm IST

नयी दिल्ली, सात फरवरी (भाषा) भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से जुड़ी ‘‘राजनीतिक मिथक’’ पर कड़ा प्रहार करने वाली एक नयी पुस्तक की सराहना की है।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने शुक्रवार को कहा कि औपनिवेशिक शासन को सोचे-समझे विस्तार और शोषण के बजाय अक्सर आवश्यक, अनिच्छुक और सभ्य बनाने वाले प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया।

वह वरिष्ठ अधिवक्ता एवं संवैधानिक विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी की पुस्तक ‘कोलॉनाइजेशन, क्रूसेड एंड फ्रीडम इन इंडिया’ के विमोचन कार्यक्रम में बोल रहे थे, जिसका प्रकाशन ‘रूपा पब्लिकेशंस’ ने किया है।

पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि औपनिवेशिक लेखन में बार-बार व्यवस्था, सभ्यता और प्रगति की भाषा मिलती है, जिसमें हस्तक्षेप को सुनियोजित विस्तार के बजाय अव्यवस्था के प्रति प्रतिक्रिया बताया जाता है।

उन्होंने कहा कि पुस्तक के लेखक ने साम्राज्यवादी लेखन में सदियों से दोहराए जाते रहे तर्कों की पहचान की और फिर उन्हें आर्थिक इतिहास, वैश्विक भू-राजनीति और तुलनात्मक औपनिवेशिक अनुभवों से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर परखा।

उन्होंने कहा कि पुस्तक लगातार दोहराए जाने वाले दावों का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा, ‘‘यह कि भारत के पास कोई वास्तविक सभ्यतागत इतिहास नहीं था, ब्रिटिश शासन ‘‘सभ्य बनाने’’ के नैतिक दायित्व से प्रेरित था और भारत में साम्राज्य व्यापार व राजनीतिक अव्यवस्था का अनपेक्षित परिणाम था।’’

चंद्रचूड़ ने कहा कि दावों को मजाक बताकर खारिज करने के बजाय, उनकी बारीकी से पड़ताल करने से पहले किताब में उनके असली रूप में पेश किया गया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने भी ब्रिटिशों पर बौद्धिक धोखाधड़ी का आरोप लगाया और कहा कि सन 1700 की सदी में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वैश्विक जीडीपी की 25 प्रतिशत थी, लेकिन 1947 तक देश लूट, भूख और आर्थिक विनाश का शिकार हो गया।

उन्होंने कहा, ‘‘हम दुनिया के लिए निर्यातक थे। हमारा कपड़ा उद्योग का बहुत बड़ा कारोबार था। हम एक समुद्री ताकत थे। हमारे पास इस तरह की ताकत थी। और आखिर में हमें क्या मिला? भूख, लूट, बर्बाद अर्थव्यवस्था और लोगों को गुलाम बनाया गया। तो यह बदलाव 1700 से 1947 के बीच हुआ और इसका श्रेय सभ्य दुनिया के असभ्य लोगों को जाता है।’’

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया।

भाषा गोला अमित

अमित


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