जिमखाना क्लब: दिल्ली का विशिष्ट ठिकाना; कनॉट प्लेस के वास्तुकार ने किया इसके भवन का डिजाइन
जिमखाना क्लब: दिल्ली का विशिष्ट ठिकाना; कनॉट प्लेस के वास्तुकार ने किया इसके भवन का डिजाइन
(कुणाल दत्त)
नयी दिल्ली, 24 मई (भाषा) राजधानी के प्रमुख और हरियाली से घिरे इलाके में स्थित दिल्ली जिमखाना क्लब लंबे समय से देश के चुनिंदा और प्रभावशाली लोगों की पसंदीदा जगह माना जाता रहा है। एक सदी से अधिक समय से अपनी भव्यता और औपनिवेशिक काल के आकर्षण को यह बरकरार रखे हुए है।
क्लब का मौजूदा परिसर, 2-सफदरजंग रोड पर 27.3 एकड़ क्षेत्र में स्थित है, जो अपनी भव्य सफेद इमारत, प्रसिद्ध ‘बॉलरूम’ और खूबसूरती से सजे हरे-भरे लॉन के लिए जाना जाता है। इस भवन की परिकल्पना प्रसिद्ध वास्तुकार रॉबर्ट टोर रसेल ने की थी, जिन्होंने दिल्ली के मशहूर कनॉट प्लेस कॉम्प्लेक्स और तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ हाउस (अब तीन मूर्ति भवन) का भी डिजाइन तैयार किया था।
हालांकि, 110 से अधिक वर्षों की यह विरासत, जिसने बिना किसी दिखावे के धन, शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा की पहचान को आकार दिया है, अब समाप्त होने की कगार पर है। केंद्र ने यह कहते हुए ऐतिहासिक क्लब को पांच जून तक अपना परिसर सौंपने के लिए कहा है कि यह भूखंड “रक्षा ढांचे को मजबूत और सुरक्षित करने” तथा अन्य महत्वपूर्ण सार्वजनिक सुरक्षा उद्देश्यों के लिए आवश्यक है।
केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के तहत भूमि एवं विकास कार्यालय (एल एंड डी ओ) द्वारा 22 मई को जारी आदेश में कहा गया है कि दिल्ली के अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्थित यह परिसर रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत और सुरक्षित करने तथा सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े अन्य अहम उद्देश्यों के लिए बेहद जरूरी है।
इस कदम के बाद टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कुछ लोग इस क्लब को औपनिवेशिक दौर की “निशानी” बता रहे हैं, जबकि अन्य का कहना है कि लुटियंस दिल्ली का एक प्रमुख आकर्षण यह क्लब इतिहास और विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसे किसी पूर्वाग्रह के बिना स्वीकार किया जाना चाहिए।
मूल रूप से तीन जुलाई, 1913 को इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब के रूप में स्थापित, इस संस्था की स्थापना मुख्य रूप से औपनिवेशिक प्रशासकों और सैन्य अधिकारियों की सेवा के लिए की गई थी।
‘‘इंपीरियल’’ शब्द को 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद हटा दिया गया, लेकिन क्लब ने अपनी प्रीमियम संपत्ति और पुराने दौर की शाही झलक को बनाए रखा। इसके स्विमिंग पूल, टेनिस कोर्ट, बिलियर्ड्स टेबल और लकड़ी के फर्श वाला भव्य बॉलरूम समाज के उच्च वर्ग और प्रभावशाली लोगों को आकर्षित करते रहे हैं।
इस क्लब का रुतबा और विशिष्टता ऐसी है कि इसकी सदस्यता प्राप्त करना भी प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इसकी प्रतीक्षा अवधि बहुत लंबी होती है।
क्लब ने 2013 में अपनी शताब्दी वर्षगांठ मनाई। दिल्ली जिमखाना क्लब के सदस्यों में पूर्व प्रधानमंत्री, वरिष्ठ सरकारी और रक्षा अधिकारी, न्यायपालिका के सदस्य, कॉरपोरेट व कारोबारी जगत के दिग्गज तथा अन्य प्रख्यात नागरिक शामिल रहे हैं।
फरवरी 2016 में, क्लब ने अपना पहला साहित्य महोत्सव आयोजित किया, जिसमें पूर्व पंजीकरण के साथ गैर-सदस्यों को भी प्रवेश दिया गया।
देश के सबसे पुराने क्लब में से एक, इस विशिष्ट ठिकाने की कहानी कई मायनों में भारत की नयी राजधानी के रूप में नयी दिल्ली के विकास की कहानी भी है। यह परिवर्तन उस समय हुआ जब 1911 के दिल्ली दरबार में की गई घोषणा के बाद राजधानी को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से स्थानांतरित किया गया।
क्लब तीन जुलाई, 1913 को अपने वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित हो गया। क्लब की वेबसाइट के अनुसार, उस समय इसे ‘इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ कहा जाता था और सर स्पेंसर हरकोर्ट बटलर इसके पहले अध्यक्ष थे।
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान जाने-माने प्रशासक सर स्पेंसर ने 1920 के दशक में आगरा और अवध के तत्कालीन संयुक्त प्रांत के पहले गवर्नर के रूप में भी कार्य किया था।
दिल्ली में जिमखाना क्लब का निर्माण 1930 के दशक की शुरुआत में इसके मौजूदा स्थल पर हुआ था। वेबसाइट के अनुसार, भवन निर्माण का ठेका वास्तुकार रॉबर्ट टोर रसेल को दिया गया था।
सर एडविन लैंडसियर लुटियंस और सर हर्बर्ट बेकर नयी राजधानी के प्रमुख वास्तुकार थे, जिसे बाद में ‘नयी दिल्ली’ नाम दिया गया। इसका निर्माण 1912 से 1931 के बीच हुआ और फरवरी 1931 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा इसका औपचारिक उद्घाटन किया गया।
क्लब की इमारत इस नयी राजधानी के बिल्कुल केंद्र में बनाई गई थी। इसका पता, 2-सफदरजंग रोड, लोक कल्याण मार्ग (पूर्व में रेस कोर्स रोड) पर स्थित प्रधानमंत्री आवास के ठीक बगल में है।
वेबसाइट के अनुसार, 1930 के दशक की शुरुआत में, तत्कालीन वायसराय लॉर्ड विलिंगडन की पत्नी लेडी विलिंगडन ने ‘‘स्विमिंग पूल के निर्माण के लिए 21,000 रुपये दान किए थे।’’
फिलहाल दिल्ली जिमखाना क्लब का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है, लेकिन इसकी विरासत और इसकी कहानी आने वाले समय में भी कायम रहेगी।
भाषा आशीष सुरेश
सुरेश

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