उच्च न्यायालय ने कार्यकर्ताओं को अवैध रूप से हिरासत में लेने, उत्पीड़न के आरोप पर पुलिस की खिंचाई की

उच्च न्यायालय ने कार्यकर्ताओं को अवैध रूप से हिरासत में लेने, उत्पीड़न के आरोप पर पुलिस की खिंचाई की

उच्च न्यायालय ने कार्यकर्ताओं को अवैध रूप से हिरासत में लेने, उत्पीड़न के आरोप पर पुलिस की खिंचाई की
Modified Date: April 23, 2026 / 08:22 pm IST
Published Date: April 23, 2026 8:22 pm IST

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, 23 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले महीने कुछ कार्यकर्ताओं को कथित रूप से प्रताड़ित किए जाने और अवैध हिरासत में लिए जाने के मामले में बृहस्पतिवार को दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई और कहा कि गंभीर आरोपों वाले मामलों में भी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ ने कहा कि पुलिस या तो उचित कार्रवाई करे, अन्यथा वह इस मामले को सीबीआई को सौंप देगी।

पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, ‘‘जब कोई किसी पर आरोप लगाता है, तो क्या आप उसे सीधे उठा लेंगे? हम ऐसा होने नहीं देंगे। अगर आपके पास उन पर शक करने के लिए कोई सबूत है, तो कानून में एक प्रक्रिया निर्धारित है… अगर आप प्रक्रिया का पालन नहीं करेंगे, तो हम आयुक्त से जांच का आदेश देने को कहेंगे। हमें आरोप की गंभीरता से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि हम प्रक्रिया को लेकर चिंतित हैं। संविधान कहता है कि प्रक्रिया कानून द्वारा निर्धारित है।’’

उच्च न्यायालय ने कहा, “हमें बताइए कि कार्रवाई की गई है, अन्यथा हम कदम उठाएंगे… हम कोई राय नहीं देंगे, लेकिन हम इतना जरूर कहेंगे कि आरोप बेहद गंभीर हैं और इसे सीबीआई को सौंपना होगा।”

पीठ ने कहा कि प्रताड़ना के गंभीर आरोप हैं, जो पूछताछ का जरिया नहीं हो सकते।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘आप भले ही आतंकवादी मामले की जांच कर रहे हों, लेकिन अगर आप किसी को गिरफ्तार करते हैं, तो आपको प्रक्रिया का पालन करना होगा।’’

दिल्ली पुलिस ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए अदालत में एक सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट पेश की।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि वह रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं है। पीठ ने निर्देश दिया कि पूरी केस फाइल 19 मई को उसके समक्ष प्रस्तुत की जाए।

उच्च न्यायालय मार्च में दयाल सिंह कॉलेज के बाहर और विजय नगर पुलिस द्वारा कथित तौर पर कई कार्यकर्ताओं को अवैध रूप से हिरासत में लिए लाने से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।

याचिकाकर्ताओं में से एक का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि जिस तरह से पुलिस ने याचिकाकर्ताओं को उठाया और हिरासत में लिया, वह ‘‘निंदनीय’’ है।

लक्षिता राजौरा की छोटी बहन ने रिट याचिका दायर की है और आरोप लगाया है कि उसे (लक्षिता) एवं अन्य विद्यार्थियों को अगवा कर न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के एक अज्ञात भवन में ले जाया गया।

पुलिस ने इस आरोप के जवाब में कहा था कि हिरासत में प्रताड़ना और अवैध हिरासत के आरोप मनगढ़ंत हैं तथा इनका मकसद माओवादी गतिविधियों से जुड़ी उनकी गतिविधियों की जारी जांच को पटरी से उतारना है।

दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने उच्च न्यायालय में जवाबी हलफनामा दाखिल कर दावा किया कि प्रदर्शनकारियों को जुलाई 2025 में दर्ज की गई एक प्राथमिकी के संबंध में केवल ‘‘कानूनी पूछताछ’’ के लिए बुलाया गया था।

पुलिस ने दावा किया कि ये कार्यकर्ता भगत सिंह छात्र एकता मंच (बीएससीईएम) जैसे संगठनों से जुड़े हैं, जो ‘राष्ट्र-विरोधी’ और ‘नक्सली’ सामग्री फैलाने का मंच हैं।

इसने कहा था, ‘‘जैसा आरोप लगाया गया है, वैसी कोई अवैध हिरासत, अपहरण, जबरदस्ती या प्रताड़ना नहीं हुई है। ये आरोप अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, विरोधाभासी हैं और इनका कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं।’’

पुलिस ने दावा किया कि पूछताछ पेशेवर तरीके से और महिला कर्मचारियों की उपस्थिति में की गई थी।

इसके अनुसार, यह जांच एक ऐसी महिला के लापता होने के मामले से संबंधित है जिसे माओवादी विचारधारा से जुड़े व्यक्तियों द्वारा बहकाया गया था।

इसने यह भी तर्क दिया कि कार्यकर्ताओं ने शारीरिक हमले के अपने दावों को साबित करने के लिए कोई चिकित्सा दस्तावेज या चिकित्सा-कानूनी मामले (एमएलसी) प्रस्तुत नहीं किए और आरोप ‘‘सोची-समझी साजिश’’ का हिस्सा हैं।

याचिका के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने 12 एवं 14 मार्च के बीच राष्ट्रीय राजधानी के विभिन्न कॉलेजों के छह विद्यार्थियों, दो श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं और विस्थापन विरोधी कार्यकर्ताओं सहित 10 लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लिया।

इनमें से कुछ विद्यार्थियों पर पिछले साल बढ़ते वायु प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन के दौरान इंडिया गेट पर माओवादी समर्थक नारे लगाने से संबंधित प्रकरण में पूर्व में मामला दर्ज किया गया था।

भाषा राजकुमार नेत्रपाल

नेत्रपाल


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